Wednesday, 12 April 2023

होम्योपैथी रिसर्च के लिए गुजराती कॉलेज का सीसीआरएच से करार

- केंद्रीय आयुष राज्यमंत्री डॉ. मुंजपरा महेन्द्रभाई की उपस्थिति में आदान - प्रदान हुआ एमओयू

इंदौर। कोरोना महामारी से संघर्ष में होम्योपैथी चिकित्सा ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। शहर, प्रदेश और देश में जहाँ एक बार फिर कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं वहीं राहत भरी खबर ये है कि आयुष मंत्रालय की केंद्रीय


होम्योपैथी अनुसंधान परिषद् (सीसीआरएच) ने गुजराती होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज, इंदौर को होम्योपैथी से जुड़े शोध कार्य करने की सहमति प्रदान कर दी है। इससे निकट भविष्य में न केवल अनेक गंभीर बीमारियों से बेहतर ढंग से निपटा जा सकेगा बल्कि शहर के स्टूडेंट्स को भी बहुत चिकित्सीय ज्ञान के लिहाज से बेहतर प्रशिक्षण और वातावरण मिलेगा।

यह जानकारी आयुष मंत्रालय, सी सी आर एच की वैज्ञानिक सलाहकार बोर्ड के सदस्य डॉ. एके द्विवेदी ने दी। उन्होंने बताया कि शोध के लिए आयुष मंत्रालय की केंद्रीय अनुसंधान परिषद् से सहमति मिलना न केवल गुजराती होम्योपैथिक
कॉलेज बल्कि पूरे इंदौर शहर के लिए एक बड़ी सौगात साबित होगी। उल्लेखनीय है कि इसी वर्ष श्री गुजराती समाज इंदौर के 100 वर्ष भी पूरे हो रहें हैं.
उक्त एमओयू पर केंद्रीय होम्योपैथिक अनुसंधान परिषद की तरफ़ से महानिदेशक डॉ सुभाष कौशिक जी एवं डॉ देवदत्त नायक जी तथा
श्रीमती कमलाबेन रावजीभाई पटेल गुजराती होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज की ओर से चेयरमैन श्री भरत भाई शाह एवं प्राचार्य डॉ. एस.पी.सिंह ने साइन किये। इस अवसर पर केंद्रीय आयुष राज्यमंत्री डॉ. मुंजपरा महेन्द्रभाई और कॉलेज के शासी निकाय के अध्यक्ष भरतभाई शाह भी मौजूद थे। अब शीघ्र ही गुजराती समाज द्वारा संचालित होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज में आयुष मंत्रालय की केंद्रीय होम्योपैथिक अनुसंधान परिषद् की देखरेख में होम्योपैथी रिसर्च प्रारम्भ हो जायेगी।

जटिल बीमारियों के होम्योपैथिक इलाज पर होगी रिसर्च

उल्लेखनीय है कि विश्व होम्योपैथी दिवस से जुड़े गरिमामय आयोजन में हिस्सा लेने के लिए भरतभाई शाह, डॉ. सिंह और डॉ. द्विवेदी गत दिनों दिल्ली में थे। उक्त आयोजन के दौरान कैंसर, एनीमिया, सीकेडी (क्रोनिक किडनी डिसीजेज), आईबीएस तथा अन्य जटिल बीमारियों के होम्योपैथिक इलाज पर रिसर्च के बारे में विस्तृत चर्चा की गई। भविष्य में अन्य चिकित्सा पद्धतियों के साथ मिलकर होम्योपैथी के जरिये मरीजों को जटिल बीमारियों से राहत दिलाने की संभावनायें भी तलाशी गईं।

होम्योपैथिक चिकित्सा, शिक्षा और अनुसंधान हेतु प्रयासरत

आयुष मंत्रालय की वैज्ञानिक सलाहकार बोर्ड में 2015 से लगातार तीसरी बार शामिल इंदौर के प्रख्यात चिकित्सक डॉ. ए.के. द्विवेदी होम्योपैथिक चिकित्सा, शिक्षा और अनुसंधान की दिशा में विशेष रूप से प्रयासरत हैं। जटिल रोगों से पीड़ित देश-विदेश के अनेक मरीजों का होम्योपैथिक चिकित्सा से सटीक उपचार कर उन्होंने न केवल मरीजों की जिंदगी बचाई है बल्कि होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति लोकप्रिय बनाने में भी अहम भूमिका भी निभाई है। कोरोना काल के दौरान उनकी अति-विशिष्ट चिकित्सकीय सेवाओं के लिए उन्हें शासन-प्रशासन द्वारा सम्मानित भी किया जा चुका है। उनकी लिखी किताब कोरोना के साथ और कोराना के बाद भी इन दिनों चर्चा में है तथा देश-विदेश की अनेक गणमान्य विभूतियों द्वारा यह किताब सराही जा रही है।

Sunday, 9 April 2023

 विश्व होम्योपैथी दिवस पर विशेष


होम्योपैथी का जनक जर्मनी रहा तो वर्तमान और भविष्य भारत है


- डॉ. ए.के. द्विवेदी 

(सदस्य, वैज्ञानिक सलाहकार बोर्ड, सी सी आर एच. आयुष मंत्रालय, भारत सरकार)

- वरिष्ठ प्रोफेसर (एस.के.आर.पी गुजराती होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज, इंदौर)

होम्योपैथी के विकास क्रम, इसकी विश्वसनीयता और लोकप्रियता के लिहाज से पिछला साल बहुत महत्वपूर्ण रहा है। कोरोना से बचाव में होम्योपैथी की महत्ता 2020-21 में कोरोना की पहली दोनों लहरों के दौरान ही सिद्ध हो गई थी। इससे लोगों का होम्यौपैथी में विश्वास बढ़ा और ये दो मिथक भी दूर हो गये कि होम्योपैथी का इलाज बहुत धीमा होता है और ये बड़ी बीमारियों के लिए बहुत प्रभावी नहीं है। आप खुद ही सोचिये कि जब होम्योपैथिक दवाओं ने कोविड-19 जैसी महामारी के फैलाव को नियंत्रित करने में अत्यंत अहम भूमिका निभाई हो, उसे हल्के में कैसे लिया जा सकता है। यही वजह है कि अब आम अवाम से लेकर खास मकाम रखने वाले समाज के हर तबके (जिसमें हर आयु और वर्ग के लोग शामिल हैं) का विश्वास होम्यौपैथी पर बहुत बढ़ गया है। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब बड़ी संख्या में कैंसर, सिकल सेल, अप्लास्टिक एनीमिया जैसी बीमारियों के मरीज भी होम्योपैथी ट्रीटमेंट अपना रहे हैं और भले-चंग होकर स्वस्थ और आनंदमय जीवन का लुत्फ उठा रहे हैं।

वैसे होम्योपैथी के बारे में लोगों के विचारों में सकारात्मक परिवर्तन 2014 में आयुष मंत्रालय के गठन के बाद से ही होने लगा था। इस मंत्रालय की बहुआयामी और बहुजनहिताय योजनाओं के चलते लोग इस चिकित्सा पैथी की ओर तेजी से आकृष्ट हो रहे थे। लगातार ठीक होते मरीजों की माउथ पब्लिसिटी ने भी इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सबसे बड़ी बात ये है कि इस पद्धति से ठीक हुए लोगों को स्थायी तौर पर आराम मिल रहा है और इसकी मीठी-मीठी गोलियों (दवाओं) का कोई साइड इफेक्ट भी नहीं है। मगर आधुनिकता की दौड़ में खुद को आगे दिखाने के चक्कर में एक दौर में कुछ लोगों ने न केवल इस पद्धति से खुद किनारा कर लिया था बल्कि वो दूसरों को भी बरगला रहे थे। लेकिन कोरोना काल में इन सबके द्वारा फैलाई गई भ्राँतियां पूरी तरह दूर हो गईं और लोग बड़ी संख्या में होम्योपैथी की ओर आकृष्ट होने लगे। 

वित्तीय वर्ष 2022-23 मेरे लिये इस मायने में भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा कि इस दौरान मैंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, मध्य प्रदेश के राज्यपाल मंगूभाई पटेल, वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण, सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी, पूर्व आयुष मंत्री श्रीपाद नाईक, इंदौर के सांसद शंकर लालवानी, इंदौर महापौर पुष्यमित्र भार्गव आदि स्वनामधन्य विभूतियों से निजी मुलाकातें कर उन्हें होम्योपैथी की खूबियों के बारे में विस्तार से बताया। यहाँ ये तथ्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति, राज्यपाल और वित्तमंत्री से मुलाकात के दौरान मैंने उनसे सिकल सेल और अप्लास्टिक एनीमिया जैसी जानलेवा बीमारियों पर अंकुश लगाने के उपाय करने का निवेदन किया और मुझे बहुत खुशी हुई कि वित्तमंत्री द्वारा प्रस्तुत बजट में सिकलसेल बीमारी को 2047 तक पूरी तरह खत्म करने का लक्ष्य रखा गया है। 

2022-23 वित्त वर्ष के दौरान मेरे कई रिसर्च पेपर प्रकाशित हुए। जिन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत सराहना मिली। मुझे यकीन है कि इन शोध कार्यों से होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति की आगे की दशा व दिशा तय करने में बहुत मदद मिलेगी। मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि होम्योपैथी का जनक बेशक जर्मनी रहा है लेकिन इसका भविष्य भारत में ही सबसे सुरक्षित है और भारत ही इसके भावी विकास क्रम को तय करेगा। होम्योपैथी को अपनाने की लिहाज से हमारी स्थिति अब भी बहुत अच्छी है और भारत को ग्लोबल लीडर के रूप में स्वीकार्यता मिल चुकी है। अंत में मेरी सभी मरीजों और आम लोगों से यही गुजारिश है कि सुनी-सुनाई बातों पर यकीन करने के बजाय आप एक बार खुले मन से होम्योपैथी को अपनायें। चिकित्सकों के परामर्श के अनुसार समग्र रूप से खान-पान और रहन-सहन पर ध्यान दें तो आप खुद ही तस्दीक करेंगे कि होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति मानव मात्र के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। इसे अपना हर व्यक्ति सुखी, सुव्यवस्थित और सुदीर्घ स्वस्थ जीवन जी सकता है। इस चिकित्सा पद्धति में भविष्य के लिहाज से अगणित संभावनायें छुपी हैं। नित नई खोजें हो रही हैं और सफलता के नये आयाम रचे जा रहे हैं।


पेश है होम्योपैथी से जुड़े कुछ रोचक सवाल और उनके जवाब .....


- क्या होम्योपैथी दवाओं के कुछ साइड इफेक्ट्स हैं? 'हीलिंग काइसिस' क्या है?

जवाब - होम्योपैथी दवाओं में साइड इफेक्ट्स के बजाय कभी-कभी 'हीलिंग काइसिस' प्रक्रिया देखने को मिलती है। जिसके द्वारा शरीर के जहरीले तत्व बाहर निकलते हैं। मसलन, किसी को बुखार की दवाई दी गई और उस व्यक्ति को लूज मोशन, उल्टी या स्किन पर एलर्जी हो जाए। दरअसल, ये दिक्कतें भी होम्योपैथी इलाज का हिस्सा हैं, लेकिन लोग इसे साइड इफेक्ट समझ लेते हैं। इस प्रक्रिया को 'हीलिंग काइसिस' कहते हैं। 


- क्या होम्योपैथी में इलाज काफी धीमा होता है? 

जवाब = 80 - 90 फीसद मामलों में लोग होम्योपैथ के पास तब पहुंचते हैं जब अन्य चिकित्सा पद्धतियों से इलाज कराकर थक चुके होते हैं। कई बार तो 15 से 20 साल से इलाज कराने के बाद पेशंट होम्योपैथ के पास पहुंचते हैं। ऐसे मामलों में इलाज में वक्त लग सकता है।


- होम्योपाथी में इलाज कैसे होता है?

जवाब - इसमें मरीज की हिस्ट्री काफी मायने रखती है। अगर किसी की बीमारी पुरानी है तो डॉक्टर उससे पूरी हिस्ट्री पूछता है। मरीज क्या सोचता है, वह किस तरह के सपने देखता है जैसे सवाल भी पूछे जाते हैं। ऐसे तमाम सवालों के जवाब जानने के बाद ही मरीज का इलाज शुरू होता है। इस पद्धित से अमूमन हर तरह की बीमारियों का समुचित इलाज हो सकता है। पुरानी और असाध्य बीमारियों के लिए तो ये सबसे अच्छा इलाज माना जाता है। एलर्जी, एग्जिमा, अस्थमा, कोलाइटिस, माइग्रेन, जैसी बीमारियों को भी होम्योपैथी जड़ से खत्म कर सकती है। कैंसर के मामलों में भी इसका परसेंटेज काफी अच्छा है। शुगर, बीपी, थाइरॉइड आदि के नए मामलों में यह पद्धति अधिक कारगर साबित होती है।


- क्या होम्योपैथी में दवा सुंघाकर भी इलाज किया जाता है?

हां, कुछ दवाएं ऐसी होती हैं, जिन्हें मरीज को सिर्फ सूंघने के लिए कहा जाता है। मसलन, साइनुसाइटिस और नाक में गांठ की समस्या होने पर डॉक्टर ऐसे ही इलाज करते हैं। 10-15 साल पहले तक होम्योपैथी इलाज के दौरान लहसुन, प्याज जैसी चीजें नहीं खाने की सलाह दी जाती थी लेकिन नए शोधों ने इस सोच को बदल दिया है। अब डॉक्टर इन चीजों को खाने की मनाही नहीं करते। अब इंसानी शरीर प्याज, लहसुन आदि के लिए नया नहीं रहा।


- क्या इस चिकित्सा पद्धति से इलाज कराते हुए कोई परहेज नहीं है?

होम्योपैथी की दवा खाने के दौरान जिस एक चीज की सख्त मनाही होती है वह है कॉफी। दरअसल, कॉफी में कैफीन होती है। कैफीन होम्योपैथी दवा के असर को काफी कम कर देती है। कुछ डॉक्टर डियो और परफ्यूम भी लगाने से मना करते हैं। माना जाता है कि इनकी खुशबू से भी दवा का असर कम हो जाता है।


- क्या दवायें प्लास्टिक या काँच की डिब्बी में होने से भी फर्क पड़ता है?

जवाब - होम्योपैथिक दवाएं कांच की बोतल में देना ही बेहतर है। अगर उस पर कॉर्क लगा हो तो और भी अच्छा। दरअसल, होम्योपैथी की दवाओं में कुछ मात्रा में अल्कोहल का उपयोग किया जाता है। अल्कोहल प्लास्टिक से रिऐक्शन कर सकता है। वैसे, आजकल प्लास्टिक बॉटल की क्वॉलिटी भी अच्छी होती है। इसलिए प्लास्टिक का इस्तेमाल भी कई डॉक्टर दवाई देने के लिए करते हैं। दरअसल, कांच की बॉटल के टूटने का खतरा होता है। इसलिए अमूमन इनका इस्तेमाल कम ही किया जाता है। 

 

- कहाँ बनी हुई दवाइयाँ ज्यादा बेहतर हैं?

जवाब - होम्योपैथी की दवाई के उत्पादन और गुणवत्ता के मामले में जर्मनी पूरी दुनिया में आगे है। इंडिया में होम्योपैथी की डिमांड को देखते कुछ जर्मन कंपनियों ने यहां भी अपने सेंटर शुरू किए हैं। कई भारतीय कंपनियां भी अच्छी दवाएं बना रही हैं। मगर मैं फिर दोहरा रहा हूँ कि होम्योपैथी का भविष्य भारत में ही है। 

 

- सफेद मीठी गोलियों और लिक्विड दवा में क्या फर्क है?

जवाब - होम्योपैथी हमेशा से ही मिनिमम डोज के सिद्धांत पर काम करती है। इसमें कोशिश की जाती है कि दवा कम से कम दी जाए इसलिए ज्यादातर डॉक्टर दवा को मीठी गोली में भिगोकर देते हैं क्योंकि सीधे लिक्विड देने पर मुंह में इसकी मात्रा ज्यादा भी चली जाती है। इससे सही इलाज में रुकावट पड़ती है। लेकिन जहाँ ज्यादा डोज दिया जा सकता है वहाँ लिक्विड फॉर्म में दवा सीधे भी दी जाती है। दरअसल होम्योपैथिक दवाएं सीधे हमारे नर्वस सिस्टम को उत्तेजित करने के लिए बनी हैं। चूंकि जीभ से पूरा नर्वस सिस्टम जुड़ा हुआ है, इसलिए हम इन दवाइयों को जीभ पर रखते हैं. अगर हम इसे जीभ पर नहीं रखेंगे तो यह सही से काम नहीं करेगी. जीभ पर रखने से दवाई का असर पूरे नर्वस सिस्टम पर एक साथ हो जाता है। जीभ से दवाई नर्वस सिस्टम में जब तक न घुसे या दवाई के साथ कुछ और चीजों का असर न हो, तब तक किसी और चीज को लेने की मनाही है। इसलिए होम्योपैथिक दवाइयों के खाने से आधे घंटा पहले और आधा घंटे बाद में कुछ भी खाने-पीने की अनुमति नहीं होती है। इन दवाओं का एक्शन मुंह से शुरू होता है।  कुछ लीक्विड फॉर्म वाली होम्योपैथिक दवाइयों को जीभ से नहीं ली जाती है. इसे पानी के साथ लिया जाता है। 


- होम्योपैथी दवायें जीभ पर रखने के पीछे क्या साइंस है?

जवाब - होम्योपैथिक दवाई में मौजूद रसायन जीभ के नीचे म्यूकस मैंब्रेन के संपर्क में आता है। यह रसायन संयोजी ऊतक तक फैल जाता है। इसके नीचे इपीथेलियम सेल्स होते हैं जिनमें असंख्य नलिकाएं होती हैं। दवाई में मौजूद रसायन इन्ही नलिकाओं के माध्यम से रक्त परिसंचरण तंत्र में पहुंच जाता है। होम्योपैथिक दवा सीधे ब्लड सर्कुलेशन में पहुंचती है। इसलिए यह तेज गति से प्रभावित अंगों तक पहुंचती है। अन्य दवाइयों के विपरीत यह सिर्फ स्लायवरी एंजाइम के संपर्क में आती है। इसलिए इसका अन्य अंगों पर कोई खास साइड इफेक्ट नहीं होता है।

Tuesday, 4 April 2023

तीन महीने चलेगा "हर इंदौरी स्वस्थ" शिविर, शुरुआत 5 अप्रैल से

इंदौर। स्वच्छता की ही तरह शहर को स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी देश का नंबर शहर बनाने के लिए प्रयत्नशील आयुष


मंत्रालय की वैज्ञानिक सलाहकार बोर्ड के सदस्य डॉ. ए.के. द्विवेदी 5 अप्रैल, बुधवार से एक विशेष चिकित्सा शिविर "हर इंदौरी स्वस्थ" का आगाज कर रहे हैं। प्रत्येक इंदौरी को स्वस्थ बनाने और विशेष रूप से युवाओं को प्राकृतिक चिकित्सा की महत्ता से रूबरू कराने के उद्देश्य से शुरू किया जा रहा ये शिविर 4 जुलाई तक जारी रहेगा। "कम्यूनिटी हेल्थ एंड वेलफेयर" के बैनर तले "एडवांस होम्योपैथिक मेडिकल रिसर्च एंड वेलफेयर सोसायटी, पीपल्याहाना" में आयोजित अपने तरह के इस अनूठे शिविर के बारे में डॉ. द्विवेदी ने बताया कि आमतौर पर सबसे ज्यादा बीमारियाँ गर्मियों के मौसम में और गर्मी तथा बरसात के संधिकाल के दौरान होती हैं। अगर हम इस दौरान इंदौरियों को सेहतमंद रखने में सफल रहे तो यह हर इंदौरी स्वस्थ अभियान के लिए मील का पत्थर साबित होगा। इसी के मद्देनजर इस त्रैमासिक शिविर के दौरान प्राकृतिक चिकित्सा सलाह पूरी तरह निःशुल्क होगी तथा उपचार भी बेहद किफायती दरों पर किया जायेगा, ताकि हर वर्ग के अधिक से अधिक लोग इस तरह त्रैमासिक स्वास्थ्य शिविर का लाभ उठा सकें।


शिविर में पूर्व पंजीयन आवश्यक कृपया कॉल 0731-4989287, +91 98935 19287
करके ही पधारें प्राकृतिक चिकित्सा हेतु एक सेट अंतः वस्त्र अवश्य लेकर आएँ.

Thursday, 30 March 2023

शिविर में 365 लोगों की स्वास्थ्य जाँच, कर मरीजों को निःशुल्क होम्योपैथिक दवाइयां वितरित

 - डॉ. ए.के. द्विवेदी ने जैन समाज के मिलन समारोह में सार्थक पहल की

इंदौर। कहने को तो ये दूसरे वार्षिक मिलन समारोह की ही तरह एक सामान्य कार्यक्रम था लेकिन इसके तहत 365 से अधिक लोगों की स्वास्थ्य जाँच एवं मरीजों को बीमारियों के अनुरूप निःशुल्क होम्योपैथिक दवाओं का वितरण कर भारत सरकार के आयुष मंत्रालय की वैज्ञानिक सलाहकार समिति के सदस्य एवं इंदौर स्थित गुजराती होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज के प्रोफ़ेसर डॉ. ए.के. द्विवेदी ने इसे यादगार बना दिया। देश के प्रख्यात होम्योपैथिक चिकित्सक की इस पहल से समारोह सार्थक और अत्यंत उपयोगी बन गया। लोगों ने भी इस प्रयास को खूब सराहा और पदाधिकारियों ने डॉ द्विवेदी को सम्मानित भी किया।

फिर बढ़ रहे हैं कोरोना के मामले ? कई लोगों ने पूछा

जैन श्वेतांबर (छोटे-साथ) समाज के वार्षिक मिलन समारोह में डॉ. द्विवेदी ने लोगों को सेहत के प्रति  जागरूक करते हुए लोगों के प्रश्नों का जवाब भी दिया तथा समझाया कि कोरोना के मामले यदि बढ़ भी रहे हैं तो डरने या घबराने की ज़रूरत नहीं है। यही समय है हमारे चेतने का और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का है। यदि हम अभी से साधारण सर्दी-जुकाम से बचाव संबंधी सावधानियां रखना शुरू कर देंगे तो ही हम खुद को, परिवार को और समाज को कोरोना जैसी महामारी के दुष्प्रभावों से बचा सकेंगे।

बीपी, शुगर समेत अन्य जरूरी जांचें की

महावीर बाग स्थित दलालबाग में आयोजित समारोह में "एडवांस्ड होम्यो हेल्थ सेंटर, होम्योपैथिक मेडिकल रिसर्च प्रा.लि. और आयुष मेडिकल वेलफेयर फाउंडेशन के तत्वावधान में हेल्थ कैंप लगाया गया था। इस दौरान डॉ. द्विवेदी के नेतृत्व में डॉक्टर्स की टीम ने लोगों की ब्लड प्रेशर, शुगर समेत अन्य जरूरी जांचें की और उन्हें आवश्यक दवाइयां निःशुल्क प्रदान की। समाजजन ने बड़ी संख्या में पहुंचकर अपने स्वास्थ्य की जांच कराई।

फायदेमंद है भुना चना और भुनी बादाम

रक्त और हीमोग्लोबिन की कमी से होने वाले रोगों अप्लास्टिक एनीमिया, सिकल सेल, थैलेसीमिया आदि के बारे में जानकारी देते हुए डॉ. द्विवेदी ने इन रोगों के शुरुआती लक्षणों के बारे में बताया। साथ ही इन रोगों से बचाव के लिए जरूरी पौष्टिक आहार के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी। डॉ. द्विवेदी ने कहा कि शरीर में रक्त कमी को दूर करने के लिए हमारे घर की रसोई में उपलब्ध भुना चना, गुड़, भुनी बादाम, भुना सोयाबीन, पालक, पपीता, सत्तू , आंवला, गाजर, चुकन्दर, छुहारा, मुनक्का, अंजीर आदि का सेवन संतुलित मात्रा में नियमित रूप से किया जा सकता है।

महिलाएं रखें बढ़ती उम्र के साथ विशेष स्वास्थ्य सावधानी

महिलाओं को खासतौर पर समय-समय पर रक्त संबंधी जांचें एवं उसके अनुरूप जरूरी उपचार कराते रहना चाहिए क्योंकि अक्सर देखने में आता है कि महिलाएं परिवार की जिम्मेदारियों को निभाने की भागदौड़ में स्वयं के स्वास्थ्य का ख्याल नहीं रख पाती है और अनेक रोगों का शिकार हो जाती है जिसके कारण मोटापा, कमर दर्द, घुटने का दर्द वैरिकोज़ वेन इत्यादि बीमारियां महिलाओं को घेर लेती हैं इसलिए उन्हें खासतौर पर अपना खयाल रखने की जरूरत है और हल्के व्यायाम तथा योग और वॉकिंग करने की समझाईश भी दी। इस अवसर पर संस्था अध्यक्ष भंवरलाल कासवा, महिला संघ संस्थापक अध्यक्ष शांता भामावत, महिला संघ अध्यक्ष कांतारानी भतेवरा, डॉ. विवेक शर्मा, डॉ. जितेंद्र पुरी, विनय पांडे, पाखी भामावत, चंचल शर्मा, श्रुति पटेल, कार्तिकेय मिश्रा, ओमप्रकाश, शुभम गोयल, राहुल भावसार आदि उपस्थित थे।

Monday, 27 March 2023

महिलाओं की अनिमियित जीवनशैली उन्हें बना रही है मोटापा, डिप्रेशन, मधुमेह आदि का शिकार

 आज की नारी हर जगह पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही है। इसी भागदौड़ भरी


लाइफस्टाइल के फेर में पड़ी नारी अपनी सेहत के प्रति कभी कभी लापरवाह हो जाती है। क्योंकि वे घर व दफ्तर के बीच दोहरी भूमिका निभाती है और सेहत का ख्याल रखने को नजरअंदाज कर जाती है। एक जानकारी के अनुसार 20 से 40 वर्ष की उम्र वाली महिलाएं अपनी बिगड़ती जीवनशैली के चलते कई बीमारियों से ग्रस्त हैं। इसी कारण महिलाओं में मोटापा, डिप्रेशन, मधुमेह, रक्तचाप जैसी जीवनशैली से जुड़ी समस्याएं बढ़ रही है। एक अध्ययन के अनुसार इस सर्वेक्षण में शामिल 21 से 52 वर्ष की उम्र वाली कामकाजी महिलाओं में से 68 प्रतिशत महिलाएं जीवनशैली संबंधी बीमारियों से पीड़ित है। भारत सरकार के आयुष मंत्रालय की वैज्ञानिक सलाहकार समिति के लगातार तीसरी बार सदस्य चुने गए देश के प्रख्यात चिकित्सक डॉ. ए.के. द्विवेदी के अनुसार महिलाएं को अपनी जीवनशैली नियमित करना चाहिए। इसके अलावा वे होम्योपैथिक उपचार भी ले सकती है। होम्योपैथिक उपचार सुरक्षित और राहत देने वाला है। इसके किसी भी तरह के साइड इफैक्ट भी नहीं है। 

कार्डियो वैस्कुर डिजीज

कार्डियो वैस्कुलर बीमारियों से आज महिलाएं भी अछूती नहीं रही। आज की महिलाएं खुद के स्वास्थ्य से अधिक महत्व अपने कैरियर को देती है। कार्डियो वैस्कुलर रोग दिल और रक्त वाहिकाओं को प्रभावित करते हैं। कुछ सामान्य कार्डियो वैस्कुलर रोगों में हाइपरटेंशन, उच्च रक्तचाप, सीओपीडी और स्ट्रोक आदि भी शामिल है। इसमें सीओपीडी उस बीमारी को कहते हैं जिसमें एयरफ्लो में रुकावट आ जाती है और जिसे पूरी तरह से ठीक नहीं किया जा सकता है। यह बीमारी आमतौर पर क्रोनिक ब्रोंकाइटिस और एम्फिसेमा के कारण होती है। सिगरेट और धूम्रपान सीओपीडी का प्रमुख कारण है।

उपाय – जीवनशैली बदलें

कार्डियो वैस्कुलर रोगों से बचने के लिए जरूरी है कि आप अपनी जीवनशैली में बदलाव लाएं। चिकित्सकों के अनुसार महिलाओं को पौष्टिक व लो कैलोरीज वाला भोजन लेना चाहिए। उन्हें अपने भोजन में कम नमक, कम वसा, कम चीनी, अधिक फाइबर और विटामिन के लिए हरी सब्जियां व फल अपने आहार में शामिल करना चाहिए। फलों का सेवन सीमित मात्रा में करें, क्योंकि फलों में ग्लूकोज की मात्रा अधिक होती है। ग्लूकोज का अधिक मात्रा में सेवन करने पर उच्च रक्त शर्करा हो सकती है। इसके आलावा तंबाकू और शराब के सेवन से बचें।

डिप्रेशन

बदलते सामाजिक परिवेश में महिलाएं बड़ी संख्या में तनाव की शिकार हो रही हैं। इनमें कामकाजी महिलाओं की तादाद ज्यादा है। महिलाओं में बढ़ते तनाव को लेकर डॉक्टर्स कहते हैं कि महिलाओं एक्सोजिनोस डिप्रेशन की शिकार होती है जिसकी वजहों में कोई घरेलू समस्या, आर्थिक समस्या, पति से अनबन, काम का अधिक बोझ, आराम न मिल पाने के कारण चिड़चिड़ापन या ऑफिस की कोई समस्या आदि हो सकती है। कई महिलाएं डिमेंशिया की भी शिकार होती है। डिमेंशिया में दिमाग के कुछ खास सेल्स नष्ट होने लगते हैं, जिसकी वजह से सोचने-समझने की शक्ति में कमी आने लगती है। तनाव के कारण महिलाओं में चिड़चिड़ाहट बढ़ जाती है। अचानक गुस्सा आना, भुलक्कड़पन, अकेले रहना और किसी से बात न करना जैसी आदतें उनमें दिखाई देने लगती है।

उपाय – साइकोथैरेपी

तनाव से बाहर निकलने के लिए महिलाओं को स्वयं ही प्रयास करना चाहिए। अपने काम को छोटे-छोटे भाग में बांट लें। मनोरंजन के लिए गाना सुनें। मेडिटेशन और व्यायाम को भी अपने दैनिक जीवन में शामिल करें। इसके अलावा आप मनोवैज्ञानिकों द्वारा दी जाने वाली साइकोथैरेपी की क्लासेस भी ज्वाइन कर सकती हैं। वहां आपको खुश रहने का तरीका, अच्छा व्यवहार करना और बदलते परिवेश के हिसाब से खुद को ढालना आदि बातें सिखाई जाती है। यह क्लासेस अवसादग्रस्त व्यक्ति की जरूरत पर निर्भर करती है।

मोटापा

मोटापा महिलाओं में होने वाली बड़ी शारीरिक समस्याओं में से एक है। अन्य देशों की अपेक्षा भारत में हार्ट, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर जैसी शारीरिक समस्याएं लोगों में काफी बढ़ी है। इसकी वजह है मोटापा। हमारे देश में 80 प्रतिशत लोग मोटापे के शिकार है। मोटापा दो प्रकार का होता है। पहला जिसमें चर्बी पेट पर चढ़ती है और दूसरे में चर्बी हिप पर चढ़ती है। महिलाओं में मोटापे के कई कारण हो सकते हैं जैसे थायरॉइड या हार्मोनल असंतुलन, लेकिन इसका सबसे बड़ा कारण है हमारा असंतुलित खाना-पान। उदाहरण के तौर पर एक दिन में 3 किलोमीटर ब्रिस्क वॉक करके आप 250 कैलोरीज बर्न कर सकते हैं, तो वहीं एक समोसा खाकर 250 कैलोरी वापस ग्रहण कर लेते हैं। महिलाओं में मोटापा अनिमयित मासिक धर्म का कारण भी बन सकता है, गर्भधारण करने में भी दिक्कतें  आ सकती हैं। अत्याधिक मोटापे के कारण स्ट्रेच मार्क्स की समस्या शुरू हो सकती है। घुटनों में दर्द, चलने के दौरान सांस फूलना और थकान महसूस करना इसके मुख्य लक्ष्ण हैं।

उपाय – संतुलित आहार और बेरिएट्रिक सर्जरी

मोटापे की समस्या से बचने के लिए जरूरी है व्यायाम। इसके आलावा कम कैलोरी युक्त मिनरल और विटामिन से भरपूर पौष्टिक भोजन लें। एक दिन में 40 मिटन की वॉक आपको फिट बनाए रखेगी। अत्यधिक मोटापे के शिकार रोगियों के लिए बेरिएट्रिक सर्जरी भी उपलब्ध है। इसमें लेप्रोस्कोपी के माध्यम से चर्बी घटाई जाती है। यह सर्जरी स्वस्थ महिलाओं के लिए ही संभव है। डायबिटीज की शिकार महिलाओं के लिए इस सर्जरी में समस्या आ सकती है।

पीठ का दर्द

पीठ का दर्द की समस्या आज महिलाओं में आम हो चुकी है। कम उम्र की महिलाएं भी इसकी शिकार हो रही है। फिजीशियंस का कहना है कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लो बैक पेन की समस्या सामान्य हो गई है। एक लंबी अवधि तक लगातार एक ही स्थित में बैठे रहना इसका मुख्य कारण है। गलत ढंग से बैठने से मांसपेशियों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। अत्यधिक वजन वाला समान उठाने के कारण भी महिलाएं लंबा बैक पेन की शिकार हो सकती है। इसके आलावा बढ़ती उम्र के साथ महिलाओं के शरीर से कैल्शियम कम होने लगता है। इसके कारण भी क पेन की शिकार हो सकती है। इसके अलावा बढ़ती उम्र के साथ महिलाओं के शरीर से कैल्शियम कम होने लगता है। इसके कारण भी बैक पेन की समस्या शुरू हो जाती है। महिलाओं को अपने बैठने के पॉश्चर पर ध्यान देना चाहिए। हमेशा पीठ और गर्दन सीधा करके बैठें। इस बारे में हड्डी रोग विशेषज्ञ का कहना है कि बैकपेन का इलाज समय रहते जरूरी है, नहीं तो यह बड़ी समस्या बन सकता है। एक महीने से अधिक समय तक दर्द होने पर आप तुरंत किसी डॉक्टर की सलाह लें। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के शरीर का वजन बढ़ने के साथ मांसपेशियों में खिंचाव होने लगता है या स्पाइनल नर्व्स में बदलाव होता है जिसके कारण यह समस्या बढ़ जाती है।

उपाय- फिजियोथैरपी

बैक पेन के लिए व्यायाम सबसे अच्छा इलाज है। अधिक दर्द होने पर आप फिजियोथैरेपी करवा सकती है। बैक पेन से परेशान रोगियों को इंटरवेंशन पेन मैंनेजमेंट ट्रीटमेंट भी दिया जाता है जिसके अंर्तगत इंजैक्शन द्वारा एक तरल पदार्थ को डिस्क तक पहुंचा कर एक्सरे में दर्द का कारण जाना जा सकता है। फिर जरूरत होने पर उपचार के लिए अगली सिटिंग दी जाती है।

डायबिटीज

एक शोध के अनुसार पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं डायबिटीज की अधिक शिकार हो रही हैं। डायबिटीज आम तौर पर व्यक्ति की खराब जीवनशैली के कारण होता है। इसके अलावा तनाव, एल्कोहल का सेवन, जंक, फैटी फूड और धुम्रपान आदि भी डायबिटीज का कारण हो सकती है। कई बार यह लोगों में आनुवंशिक तौर पर भी होता है। अत्यधिक कैलोरीज युक्त खानपान भी इसका कारण है, खासतौर पर सॉफ्ट ड्रिंक का अधिक सेवन, ड्रिंक में मिला एक्सट्रा शुगर, कैफीन और कलर स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है। ज्यादा कैफीन से शरीर में कैल्शियम नष्ट होने लगता है। ज्यादा शुगर से इंसुलिन लेवल में गड़बडी आ सकती है। ज्यादा भूख लगना या थकान महसूस होना, अचानक वजन कम होना, किसी भी घाव को ठीक होने में समय लगना और सांस फूलना आदि डायबिटीज के मुख्य लक्ष्ण है। अक्सर गर्भावस्था के दौरान अस्थाई तौर पर भी महिलाओं को डायबिटीज हो सकती है।

उपाय- व्यायाम और बाइट 

डायबिटीज की शिकार महिलाओं को व्यायाम जरूर करना चाहिए। अपने बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) के बारे में जानकारी रखें और डायटीशियन के हिसाब से डाइट लें। शुगर और ब्लड प्रेशर का एक साथ होना खतरनाक होता है। इसलिए हर सप्ताह इसे चैक करवाती रहें।

डीएवीवी में "स्कूल ऑफ आयुष" शुरू करने को लेकर बनी सैद्धांतिक सहमति

 राज्यपाल से इंदौर सांसद शंकर लालवानी जी के साथ भेंट के दौरान वैज्ञानिक सलाहकार बोर्ड के सदस्य ने की चर्चा

इंदौर। देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के तहत जल्द ही स्कूल ऑफ आयुष की स्थापना की जाएगी। यह जानकारी


भारत सरकार के आयुष मंत्रालय की वैज्ञानिक सलाहकार समिति के लगातार तीसरी बार सदस्य चुने गए देश के प्रख्यात चिकित्सक डॉ. ए.के. द्विवेदी ने दी। उन्होंने  इंदौर सांसद श्री शंकर लालवानी जी के साथ महामहिम राज्यपाल श्री मंगुभाई पटेल जी को ज्ञापन देकर इंदौर के देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के तहत स्कूल ऑफ आयुष शुरू करने का निवेदन किया था, ताकि सिकलसेल और अप्लास्टिक एनीमिया जैसी अन्य गंभीर बीमारियों से निपटने में मदद मिल सके।

राज्यपाल ने डॉक्टर द्विवेदी के आग्रह को स्वीकार करते हुए विश्वविद्यालय में "स्कूल आफ आयुष" शुरू करने को लेकर सैद्धांतिक सहमति दे दी है। उन्होंने आश्वस्त किया है कि इस संबंध में वो जल्द ही कैबिनेट के संबंधित अधिकारियों से चर्चा कर अगले सत्र में देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में स्कूल आफ आयुष शुरू करने के हर संभव प्रयास करेंगे।

देश को 2047 तक एनीमिया मुक्त बनाने का लक्ष्य

उल्लेखनीय है कि सिकलसेल और अप्लास्टिक एनीमिया जैसी घातक बीमारियों से विशेष रुप से आदिवासी क्षेत्र में हो रहे दुष्परिणामों को लेकर डॉ. द्विवेदी ने राष्ट्रपति श्रीमति द्रौपदी मुर्मू जी और वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण जी से भी उनकी इंदौर यात्रा के दौरान चर्चा की थी। नए बजट में केंद्र सरकार ने भी देश को 2047 तक एनीमिया मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा है। इसके दृष्टिगत विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ आयुष की स्थापना अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी है। एनीमिया (सिकलसेल) निवारण के लिए डॉ. द्विवेदी द्वारा लंबे समय से जन जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। उनके द्वारा प्रत्येक वर्ष फरवरी माह के अन्तिम रविवार से मार्च के प्रथम रविवार तक इन्दौर में एनीमिया रथ के माध्यम से जागरूकता अभियान चलाया जाता है। इसमें डॉक्टरों, नर्सों, पैरामेडिकल स्टाफ, मरीजों एवं आम लोगों के साथ-साथ इंदौर के सांसद शंकर लालवानी भी प्रमुखता से हिस्सा लेते हैं।

"स्कूल ऑफ आयुष" की स्थापना से इस लक्ष्य प्राप्ति में मिलेगी मदद

राज्यपाल से डॉ. द्विवेदी की भेंट के दौरान मौजूद श्री लालवानी भी मानते हैं कि सिकल सेल और अप्लास्टिक एनीमिया जैसी बीमारियों की रोकथाम की दिशा में स्कूल ऑफ आयुष की स्थापना एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकती है। इससे इस लक्ष्य प्राप्ति में बहुत मदद मिलेगी। इस वर्ष डॉ. द्विवेदी द्वारा जन-जागरूकता के तहत चलाये गये एनीमिया रथ ने इंदौर शहर तथा आसपास के क्षेत्रों में 8 दिनों में लगभग 200 किलोमीटर का भ्रमण किया। इस दौरान रथ के साथ चलने वाली होम्योपैथिक चिकित्सकों की टीम ने करीब 35 हजार लोगों से मिलकर एनीमिया के लक्षण, होम्योपैथिक उपचार तथा खानपान की जानकारी दी। श्री लालवानी कहते हैं कि जिस तरह से इन्दौर स्वच्छता में नम्बर-1 है उसी तरह से डॉ. ए.के. द्विवेदी के अथक प्रयासों से ये एनीमिया मुक्त में भी नम्बर-1 बनेगा।

Monday, 20 March 2023

थायरॉइड: जानिए इसके कारण, लक्षण और बचाव के उपाय

 आज के समय में हम सभी स्वस्थ रहना चाहते हैं। लेकिन व्यस्त जीवनशैली, अव्यवस्थित खानपान, शारीरिक श्रम


का अभाव जैसे विभिन्न कारणों से हम बीमार पड़ते रहते हैं। कोई न कोई रोग हमारे जीवन को प्रभावित कर ही देता है और हम परेशान होते रहते हैं। इसके अलावा कुछ रोग ऐसे होते हैं जो हमारे शरीर की ग्रंथियों से जुड़े होते हैं। इन्हीं में से एक है थायरॉइड रोग, जो कि हमारी थायरॉइड ग्रंथि से जुड़ा होता है। इसी से जुड़े रोग को थायरॉइड रोग कहा जाता है।

थायरॉइड क्या है?

थायरॉइड गले में पाई जाने वाली तितली के आकार की एक ग्रंथि होती है। ये सांस की नली के ऊपर होती है। यह मानव शरीर में पाई जाने वाली सबसे बड़ी अतस्रावी ग्रंथियों में से एक होती है। इसी थायरॉइड ग्रंथि में गड़बड़ी आने से ही थायरॉइड से संबंधित रोग होते हैं।

थायरॉइड हार्मोन का क्या काम है?

थायरॉइड हार्मोन के कार्य निम्नलिखित हैं

  • यह हमारे शरीर में थायरोक्सिन हार्मोन वसा,
  • प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट के चयापचय को नियंत्रित रखता है।
  • यह रक्त में चीनी, कोलेस्ट्रॉल और फोस्फोलिपिड की मात्रा को कम करता है।
  • यह हड्डियों, पेशियों, लैंगिक और मानसिक वृद्धि को नियंत्रित करता है।
  • हृदयगति और रक्तचाप को नियंत्रित रखता है।
  • महिलाओं में दुग्धस्राव को बढ़ाता है।

 

थायरॉइड रोग के प्रकार

थायरॉइड ग्रंथि से जुड़े विकार दो प्रकार के होते हैं।

  • थायरॉइड ग्रंथि की अतिसक्रियता
  • थायरॉइड ग्रंथि की अल्पसक्रियता

 

थायरॉइड ग्रंथि की अतिसक्रियता: जब थायरॉइड ग्रंथि की अतिसक्रियता हो जाती है तो T3 And T4 हार्मोन का आवश्यकता से अधिक उत्पादन होने लगता है। जब इन हार्मोन्स का उत्पादन अधिक मात्रा में होने लगता है तो फलस्वरूप शरीर भी ऊर्जा का उपयोग अधिक मात्रा में करने लगता है। इसे ही हाइपरथायरायडिज्म कहा जाता है। यह समस्या पुरुषों की तुलना महिलाओं में यह अधिक देखी जाती है। थायरॉइड ग्रंथि की अतिसक्रियता के कारण शरीर में मेटाबोलिज्म बढ़ जाता है। जिसके निम्नलिखित लक्षण देखने को मिलते हैं।

  • घबराहट
  • अनिद्रा
  • चिड़चिड़ापन
  • हाथों का काँपना
  • अधिक पसीना आना
  • दिल की धडक़न बढ़ना
  • बालों का पतला होना एवं झड़ना
  • मांसपेशियों में कमजोरी एवं दर्द रहना
  • अत्यधिक भूख लगना
  • वजन का घटना
  • महिलाओं में मासिक धर्म की अनियमितता
  • ओस्टियोपोरोसिस से हड्डी में कैल्शियम तेजी से खत्म होना आदि।

थायरॉइड ग्रंथि की अल्पसक्रियता: थायराइड की अल्प सक्रियता के कारण हाइपोथायरायडिज्म हो जाता है। जिसके लक्षण निम्नलिखित है।

  • धडक़न धीमी होना।
  • हमेशा थकावट का अनुभव
  • अवसाद या डिप्रेशन
  • सर्दी के प्रति अधिक संवेदनशील
  • वजन का बढ़ना
  • नाखूनों का पतला होकर टूटना
  • पसीना नहीं आना या कम आना
  • त्वचा में सूखापन और खुजली होना
  • जोड़ों में दर्द और मांसपेशियों में अकड़न
  • बालों का अधिक झड़ना
  • कब्ज रहना
  • आँखों में सूजन
  • बार-बार भूलना
  • सोचने-समझने में असमर्थ
  • मासिक धर्म में अनियमितता
  • कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढऩा आदि।

 

थायरॉइड रोग क्यों होता है?

  • थायरॉइड रोग होने के निम्नलिखित कारण है।
  • अव्यवस्थित लाइफस्टाइल
  • खाने में आयोडीन कम या अधिकता
  • ज्यादा चिंता करना
  • वंशानुगत
  • गलत खानपान और देर रात तक जागना
  • डिप्रेशन की दवाईयों लेना
  • डायबिटीज
  • भोजन में सोया उत्पादों का अधिक इस्तेमाल
  • उपरोक्त के अलावा थायरॉइड इन कारणों से भी हो सकता है।
  • हाशिमोटो रोग
  • थायरॉइड ग्रंथि में सूजन
  • ग्रेव्स रोग
  • गण्डमाला रोग
  • विटामिन बी 12 की कमी

थायरॉइड से बचाव के उपाय

आप निम्नलिखित उपायों को अपनाकर थायरॉइड से बच सकते हैं।

  • रोजाना योग करना
  • वर्कआउट या शारीरिक श्रम
  • सेब का सेवन
  • रात में हल्दी का दूध पीना
  • धूप में बैठना
  • नारियल तेल से बना खाना खाना
  • पर्याप्त मात्रा में नींद लेना
  • ज्यादा फलों एवं सब्जियों को भोजन में शामिल करें
  • हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन
  • पोषक तत्वों से भरपूर भोजन करें

थायरॉइड में क्या नहीं खाना चाहिए?

  • धूम्रपान, एल्कोहल का सेवन नहीं करना
  • चीनी, चावल, ऑयली फूड का सेवन नहीं करे
  • मसालेदार खाने से बचे
  • मैदे से बनी चीजें नहीं खाएं
  • चाय और कॉफी का सेवन नहीं करे

थायरॉइड का इलाज क्या है?

थायरॉइड से स्बन्धित बीमारी मुख्य रूप से अस्वस्थ खान-पान और तनावपूर्ण जीवन से होती होती है। ऐसे में सबसे पहले अपने खान-पान का ध्यान रखें और तनाव लेने से बचें। साथ ही थायरॉइड के इलाज के लिए आपको डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।