Sunday, 3 February 2019

उम्र बढऩे के साथ बढऩे लगती है प्रोस्टेट कैंसर की संभावना



प्रोस्टेट कैंसर फैलने के कई कारण हैं। लेकिन शुरूआती अवस्था में प्रोस्टेट कैंसर के फैलने का कारण आनुवांशिक होता है। आनुवांशिक डीएनए प्रोस्टेट कैंसर होने का सबसे प्रमुख कारण है। प्रोस्टेट ग्लैंड यूरिनरी ब्लैडर के पास होता है, इस ग्रंथि से निकलने वाला पदार्थ यौन क्रिया में सहायक बनता है। आमतौर पर उम्र बढऩे के साथ ही प्रोस्टेट कैंसर होने की संभावना ज्यादा होती है, लेकिन आजकल की दिनचर्या के कारण यह किसी भी उम्र के लोगों को हो सकता है। दोनों पैरों में कमजोरी व पीठ में दर्द महसूस होता है। बढ़ती उम्र, मोटापा, धूम्रपान, आलस्यपूर्ण दिनचर्या और अधिक मात्रा में वसायुक्त पदार्थो का सेवन करने के कारण प्रोस्टेट कैंसर होने की संभावना ज्यादा होती है।

प्रोस्टेट क्या है?

प्रोस्टेट ग्रंथि केवल पुरूषो में पाई जाती है जो उनके प्रजनन प्रणाली का एक हिस्सा है। यह मूत्राशय के नीचे और मलाशय के सामने स्थित होती है। पौरूष ग्रंथि मूत्रमार्ग के चारों और होता है, मूत्रमार्ग मूत्र को मूत्राशय से लिंग के रास्ते निष्कासित करता है। वीर्य पुटिका ग्रंथि जो वीर्य का तरल पदार्थ बनाती है पौरूष ग्रंथि के पीछे स्थित होती है। पौरूष ग्रंथि दो भागो में विभाजित होती है, दाँए और बाँए। उम्र के साथ पौरूष ग्रंथि के आकार में परिवर्तन होता रहता है। युवावस्था में पौरूष ग्रंथि के माप में तीव्र वृद्धि होती है। 

कैसे फैलता है प्रोस्टेट कैंसर

प्रोस्टेट कैंसर प्रोस्टेट की कोशिकाओं में बनने वाला एक प्रकार का कैंसर है। यद्यपि पौरूष ग्रंथि में कई प्राकर की कोशिकाएँ पाई जाती है, लगभग सभी प्रोस्टेट कैंसर, ग्रंथि कोशिकाओं से विकसित करते है (एडिनोकार्सिनोमा)। प्रोस्टेट कैंसर आमतौर पर बहुत ही धीमी गति से बढ़ता है। ज्यादातर रोगियों में तब तक लक्षण नही दिखाई देते जब तक कि कैसर उन्नत अवस्था में नही पहुँचता। प्रोस्टेट कैंसर के मरीजों में से अधिकांश अन्य कारणों से मरते हैं। कई मरीजों को तो ज्ञात ही नहीं होता कि उन्हें प्रोस्टेट कैंसर हैं। लेकिन एक बार प्रोस्टेट कैंसर विकसित हो जाता है और बाहर की तरफ फैलने लगता है तो यह खतरनाक हो जाता है।

प्रोस्टेट कैंसर फैलने के कारण

बढ़ती उम्र 
प्रोस्टेट कैंसर सबसे ज्यादा 40 साल की उम्र के बाद होता है। उम्र बढऩे के साथ ही प्रोस्टेट ग्लैंड बढऩे लगती है जो कि कैंसर होने की संभावना को बढ़ाती है। 50 साल की उम्र पार कर रहे लोगों में यह कैंसर बहुत तेजी से फैलता है। प्रोस्टेट कैंसर के हर 3 में से 2 मरीजों की उम्र 65 या उससे ज्यादा होती है।
आनुवांशिक बीमारी 
प्रोस्टेट कैंसर आनुवांशिक भी होता है। घर में अगर किसी भी व्यक्ति या रिश्तेदार को प्रोस्टेट कैंसर होता है तो बच्चों में इसके होने की संभावना ज्यादा होती है। अगर किसी के भाई को अपने पिता से यह इंफेक्शन मिलता है तो उसके छोटे भाई को भी इससे प्रभावित होने की संभावना ज्यादा होती है।
खान-पान 
आधुनिक जीवनशैली में खान-पान भी प्रोस्टेट कैंसर के फैलने का प्रमुख कारण बन गया है। लेकिन अभी इस बारे में कोई निश्चित निष्कर्ष नहीं निकल पाया है। जो आदमी लाल मांस (रेड मीट) या फिर ज्यादा वसायुक्त डेयरी उत्पादों का प्रयोग करते हैं उनमें प्रोस्टेट कैंसर होने की संभावना ज्यादा होती है। लेकिन ज्यादा वसायुक्त खाद्य-पदार्थों का सेवन ही प्रोस्टेट कैंसर का प्रमुख कारण है इस बात पर अभी भी आशंका है। जंक फूड का सेवन भी प्रोस्टेट कैंसर होने की संभावना को बढ़ाता है। 
मोटापा 
मोटापा कई बीमारियों की जड़ है। मोटे लोगों को डायबिटीज कई सामान्य बीमारियां होना आम बात है। लेकिन मोटापा प्रोस्टेट कैंसर के फैलने का एक कारण है। मोटापे से ग्रस्त लोगों को प्रोस्टेट कैंसर होने की ज्यादा संभावना होती है। लेकिन इस तथ्य की पुष्टि नहीं हो पायी है कि मोटापा भी प्रोस्टेट कैंसर होने का प्रमुख कारण है लेकिन कुछ अध्ययनों में यह बात सामने आयी है। 
धूम्रपान 
धू्म्रपान करने से मुंह और फेफड़े का कैंसर तो होता है लेकिन धूम्रपान प्रोस्टेट कैंसर को भी बढ़ाता है। धूम्रपान करने वालों को प्रोस्टेट कैंसर होने की ज्यादा संभावना होती है। सिगरेट में पाया जाने वाला निकोटीन प्रोस्टेट कैंसर को बढ़ाता है। 
कम प्रजनन क्षमता वाले लोगों में भी प्रोस्टेट कैंसर होने की ज्यादा संभावना होती है। यदि सही समय पर इस मर्ज का पता लग जाए, तो सर्जरी के जरिए प्रोस्टेट कैंसर से निजात पाना संभव है। इसलिए अगर उम्र बढऩे के बाद प्रोस्टेट कैंसर के लक्षण दिखे तो चिकित्सिक से संपर्क जरूर कीजिए।

होम्योपैथिक समाधान 

जैसे-जैसे व्यक्ति की उम्र बढऩे लगती है उसे बीमारियों का दु:ख-दर्द सताने लगता है। बढ़ती उम्र के साथ प्रोस्टेट का बढऩा, प्रोस्टेट का कैंसर जैसी शिकायतों का सामना होने लगता है और व्यक्ति को आपरेशन, कीमोथैरेपी, रेडियोथेरेपी के बाद भी उस दर्द से छुटकारा नहीं मिलता तब वो होम्योपैथिक के शरण में आते हैं। देश ही नहीं अपितु विदेशों में भी कई अतंरराष्ट्रीय कांफे्रस में होम्योपैथिक चिकित्सा द्वारा प्रोस्टेट कैंसर की बीमारी पर अपना व्याख्यान एवं शोध पत्र पढ़ चुके डॉ. ए.के. द्विवेदी के अनुसार उनके पास जब तक मरीज पहुंचता है उसके उम्र के आखिरी पड़ाव में होता है, बीमारी का अंतिम स्टेज होता है और सभी उपलब्ध उपायों को आजमाने के बाद आशानुरूप परिणाम नहीं मिलने के कारण निराशा और हताशा से ग्रसित हो जाता है। ऐसे सभी निराश मरीजों पर इंदौर स्थित एडवांस्ड होम्यो हेल्थ सेंटर एवं होम्योपैथिक अनुसंधान केंद्र से होम्योपैथी की ५० मिलिसिमल पोटेंसी की दवाइयों के प्रयोग से हजारों मरीजों को प्रोस्टेट की समस्या से छुटकारा दिलाते हुए मानसिक सम्बल प्रदान करने का कार्य कर रहे हैं। डॉ. ए.के. द्विवेदी के अनुसार जब भी आपको मूत्र से संबंधित कोई भी परेशानी होने लगे तो तुरंत ही उचित जांच कराते हुए होम्योपैथिक चिकित्सा को अपनाएं।

Tuesday, 1 January 2019

सकारात्मक ऊर्जा का प्रयोग कर सम्पूर्ण विकास करते रहे

कैलेण्डर नववर्ष यानि आने वाले कल का स्वागत और बीते हुए वर्ष की विदाई!
स्वागत और विदाई दोनों शब्दों में विरोधाभास है फिर भी दोनों 
महत्वपूर्ण हैं क्योंकि जब तक पुराना विदा न होगा 
तब तक नए का स्वागत कैसे होगा।
हमने हमारी बीती जिंदगी या वर्ष में जो भी गलती की हो उसे सुधारने के लिए 
फिर नया वर्ष, नया समय हमें ईश्वर की ओर से प्राप्त हुआ है 
जिसमें हम अपनी सम्पूर्ण सकारात्मक ऊर्जा का उपयोग कर 
हमारे आने वाले कई नववर्षों का आनंद उठा सके 
और जीवन के उल्लास का उत्सव मनाते रहें...
इसी कामना के साथ कैलेण्डर नववर्ष 
२०१९ की हार्दिक शुभकामनाएं...
डॉ. ए.के. द्विवेदी

Tuesday, 6 November 2018

दीपावली के दौरान कैसे करें स्वास्थ्य की देखभाल


दीपावली एक खुशियो का त्योहार है और इसे सम्पूर्ण हर्ष और उल्लास के साथ मनाना चाहिए. एक छोटी सी योजना और थोड़ा सी अतिरिक्त देखभाल के साथ आप एक स्वस्थ दीवाली का आनन्द उठा सकते है. कैसे रखे शरीर कि देखभाल आइए जाने :

मिठाईयो से बचे 


ये बात शायद बहुत से लोगो को बुरी लगे परंतु त्योहारो के आते ही मिलावटी मिठाईयो कि उत्पादकता बढ़ जाती है ताकि लोग ज्यादा से ज्यादा मिलावटी मिठाई बेच कर मुनाफा कमा सके. इसलिए जितना हो सके मिठाईयो से परहेज करें या कौशिश करें कि मिठाई घर पर बनी हो. खोये से बनने वाले उत्पादो से दूर रहे या घर पर बने खोये का इस्तेमाल करें. पेठे का इस्तेमाल किया जा सकता है या फिर बेसन से बने उत्पादो का.

खुद को हाइड्रेटेड रखें 


कुछ लोग इस बात का ही पता नहीं चला पाते कि वे भूखे है या फिर प्यासे. परंतु अपने आप को हाइड्रेटेड रखना भी बहुत जरूरी है. कोल्ड ड्रिंक इत्यादि का सेवन करने कि वजाय ताज़ा जूस, दूध , नारियल का पानी या फिर नींबू पानी का सेवन करें 7 दिन में कम से कम 2-3 लिटर पानी जरूर पिये .

शरीर को आराम दे 


अपने शरीर को भरपूर आराम दे और दीवाली के दिन सफर करने से बचे. तयोहारों के बीच हम अक्सर अपने स्वास्थ्य को अनदेखा करते है जो हुमे नहीं करना चाहिए.

प्रदूषण से बचे 

पटाखो से निकलने वाला धुआँ आपके लिए नुकसानदेयक हो सकता है. पटाखे इत्यादि का उपयोग सावधानी से करे और बच्चो को अकेले इसका इस्तेमाल ना करने दे. किसी भी प्रकार कि दुर्घटना से बचे. और हो सके तो ग्रीन दीवाली का हिस्सा बने.

मन को प्रसन्न रखे 

जो खुशी दूसरों को खुशी देने में है वैसी खुशी कन्ही और नहीं 7 खुशिया बांटने से बढ़ती है इसलिए खुशिया बांटें और खुद भी खुश रहे .

आप सभी को हमारी पूरी टीम कि ओर से दीपावली कि हार्दिक सुभकामनाए. आपकी दीपावली मंगलमय हो "शुभ दीपावली" 

Thursday, 11 October 2018

नवरात्रि में क्यों खेला जाता है गरबा?


शारदीय नवरात्रि आते ही गरबे की धूम छा जाती है। गुजरात का पारम्पारिक नृत्य अब धीरे धीरे पूरे देश में नवरात्रि के दौरान बहुत ही उत्साह के साथ खेला जाता है। जानिए, क्यों नवरात्रि में अखंड ज्योत जलाई जाती है.. बहुत से लोग तो ऐसे हैं जो नवरात्रि का इंतजार ही इसलिए करते हैं क्योंकि इस दौरान उन्हें गरबा खेलने, रंग-बिरंगे कपड़े पहनने का अवसर मिलेगा। नवरात्रि में गरबा खेलना और गरबे की रौनक का आनंद उठाना तो ठीक है लेकिन क्या आप जानते हैं कि गरबा खेलने की शुरुआत कहां से हुई और नवरात्रि के दिनों में ही इसे क्यों खेला जाता है? गरबा और नवरात्रि का कनेक्शन आज से कई वर्ष पुराना है। पहले इसे केवल गुजरात और राजस्थान जैसे पारंपरिक स्थानों पर ही खेला जाता था लेकिन धीरे-धीरे इसे पूरे भारत समेत विश्व के कई देशों ने स्वीकार कर लिया। घट स्थापना से शुरु दीप गर्भ के स्थापित होने के बाद महिलाएं और युवतियां रंग-बिरंगे कपड़े पहनकर मां शक्ति के समक्ष नृत्य कर उन्हें प्रसन्न करती हैं। गर्भ दीप स्त्री की सृजनशक्ति का प्रतीक है और गरबा इसी दीप गर्भ का अपभ्रंश रूप है। घट स्थापना गरबा को लोग पवित्र परंपरा से जोड़ते हैं और ऐसा कहा जाता है कि यह नृत्य मां दुर्गा को काफी पसंद हैं इसलिए नवरात्रि के दिनों में इस नृत्य के जरिये मां को प्रसन्न करने की कोशिश की जाती है। इसलिए घट स्थापना होने के बाद इस नृत्य का आरंभ होता है।  इसलिए आपको हर डांडिया या गरबा खेलते वक्त महिलाएं सजे हुए घट के साथ दिखाई देती है। जिस पर दिया जलाकर इस नृत्य का आरंभ किया जाता है। यह घट दीपगर्भ कहलाता है और दीपगर्भ ही गरबा कहलाता है। क्यों किया जाता है तीन ताली का उपयोग आपने देखा होगा कि जब महिलाएं समूह बनाकर गरबा खेलती हैं तो वे तीन तालियों का प्रयोग करती हैं। इसके पीछे भी एक महत्वपूर्ण कारण विद्यमान है। क्या कभी आपने सोचा है गरबे में एक-दो नहीं वरन् तीन तालियों का ही प्रयोग क्यों होता है? ब्रह्मा, विष्णु, महेश, देवों की इस त्रिमूर्ति के आसपास ही पूरा ब्रह्मांड घूमता है। इन तीन देवों की कलाओं को एकत्र कर शक्ति का आह्वान किया जाता है। इसलिए तीन ताली का प्रयोग किया जाता है।

Wednesday, 10 October 2018

नवरात्रि - देवियों के नौ रूप एवं नारी सम्मान


भारत में नवरात्र का पर्व, एक ऐसा पर्व है जो हमारी संस्कृति में महिलाओं के गरिमामय स्थान को दर्शाता है. नवरात्रि संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ होता है 9 रातें. यह त्यौहार साल में दो बार आता है. एक शारदीय नवरात्रि और दूसरा है चैत्रीय नवरात्रि. यह तीन हिंदू देवियों देवी पार्वती, देवी लक्ष्मी और देवी सरस्वती के नौ विभिन्न स्वरूपों की उपासना के लिए निर्धारित है. इन्हें नवदुर्गा के नाम से भी जाना जाता है. तो आइये इन पंक्तियों के साथ देवियों के विभिन्न स्वरुपों को जानने का प्रयत्न करते हैं-

या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धा रूपेण संस्थिता।।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।


शैलपुत्री

शैल पुत्री माता को नौ दुर्गा का पहला रूप माना जाता है. इनकी पूजा नवरात्रि के पहले दिन की जाती है. पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लेने के कारण इनका नाम शैल पुत्री पड़ा. मां शैल पुत्री के इस रूप में दाएं हाथ में त्रिशूल और बाए हाथ में कमल सुशोभित है. वैसे तो माता को पिछले जन्म में दक्ष की भी पुत्री माना जाता है. माता को भगवान शिव की पत्नी भी कहा जाता है. माता शैल पुत्री के बारे में कहा जाता है कि अपने पिता दक्ष के द्वारा भगवान शिव का अपमान करने के बाद उन्होंने खुद को भस्म कर दिया था.
निश्चित रुप से भगवान शिव के लिए आदर का भाव रखने वाली माता शैलपुत्री से आज के समाज को सीखने की जरुरत है. अक्सर देखा जाता है कि आदर भाव तो छोडि़ए, लोग एक पल नहीं लगाते किसी को कुछ कहने के लिए. काश माता शैलपुत्री के भाव से नासमझ लोग कुछ सीख सकते.

देवी ब्रह्मचारिणी

नौ दुर्गा का दूसरा रूप मानी जाने वाली ब्रह्मचारिणी माता की पूजा नवरात्रि के दूसरे दिन की जाती है. माना जाता है कि माता ब्रह्मचारिणी की उपासना करने से संयम की वृद्धि और शक्ति का संचार होता है. नवरात्रि में भक्त मां की पूजा इसलिए करते हैं ताकि उनका जीवन सफल बन जाए और वह किसी प्रकार आने वाली परेशानी से निपट सकें. मां ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में गुलाब और बाएं हाथ में कमंडल है. मां ब्रह्मचारिणी को पर्वत हिमवान की बेटी कहा जाता है.
माता के बारे में कहा जाता है कि नारद मुनि ने उनके लिए भविष्यवाणी की थी कि उनकी शादी भोले नाथ से होगी, जिसके लिए उन्हें कठोर तपस्या करनी होगी. चूंकि माता को भगवान शिव से ही शादी करनी ही थी, इसलिए वह तप के लिए जंगल चली गई थीं.
इस कारण ही उनको ब्रह्मचारिणी कहा जाता है. आज देखा जाए तो हर घर में कलह और द्वेष का माहौल है. लोग एक दूसरे को नीचा दिखाने में लगे रहते हैं. परिवारों में सुख-समृद्धि का अकाल सा पड़ा दिखाई देता है. मां ब्रह्मचारिणी से प्रार्थना है कि वह ऐसे अशांत मन वाले भक्तों के मन में शांति और तप भाव का संचार करें.

देवी चंद्रघंटा

माता चंद्र घंटा को नवदुर्गा का तीसरा रूप माना जाता है. नवरात्रि के तीसरे दिन इनकी पूजा की जाती है. माता चंद्रघंटा के सर पर आधा चंद्र है, इसलिए माता को चंद्र घंटा कहा जाता है. माता चंद्र घंटा का यह रूप हमेशा अपने भक्तों को शांति देने वाला और कल्याणकारी होता है. वह हमेशा शेर पर विराजमान होकर संघर्ष के लिए खड़ी रहती हैं. माता चंद्र घंटा को हिम्मत और साहस का रूप भी माना जाता है, लेकिन इसके बावजूद समाज में जिस तरह से लोगों के अंदर अशांति, असहजता और अकारण किसी गलत रास्ते पर चलने का भाव तेजी से पनपता जा रहा है, वह चिंता का विषय है. उम्मीद की जानी चाहिए कि इस नवरात्र में माता चंद्रघंटा अपने भक्तों का कल्याण करेंगी, ताकि वह सही रास्ते पर चल सकें.

माँ कूष्मांडा

माता का चौथा रूप कूष्मांडा है. इनकी पूजा नवरात्री के चौथे दिन की जाती है. इन्हें ब्रह्मांड की जननी के रूप में जाना जाता है. उनके प्रकाश से ही ब्रह्मांड बनता है. माता कुष्मांडा सूर्य के जैसे सभी दिशाओं मे अपनी चमक बिखेरती रहती हैं. शेर पर बैठी माता कूष्मांडा के पास आठ हाथ हैं. माता कुष्माडा से हम सबको प्रार्थना करनी चाहिए कि इस नवरात्र में वह संसार मे फैले अंधेरे को अपने प्रकाश से प्रकाशमय कर दें, ताकि भक्तों का कल्याण हो सके.

स्कंदमाता

स्कन्दमाता को नौ देवी का पांचवा रूप कहा जाता है. इनकी पूजा पांचवे दिन होती है. भगवान स्कन्द 'कार्तिकेयÓ की माता होने की वजह से इन्हें स्कन्द माता का नाम मिला है. माता की चार भुजायें हैं. कमल पर विराजमान माता सफेद रंग की हैं और उनके दोनों हाथों में कमल रहता है. इस वजह से माता को पद्मासना और विद्यावाहिनी दुर्गा देवी भी कहा जाता है. स्कन्दमाता के बारे मेंं कहा जाता है कि वह अपने भक्तों का कल्याण करती हैं. माता से प्रार्थना है कि वह समाज में चारों ओर फैले अंध विश्वास को हर लेंगी, ताकि रूढिय़ों से परे हटकर भक्तगण मनुष्यता की राह पर अग्रसर हो सकें.

माँ कात्यायनी

कात्यायनी मां को दुर्गा का छठा रूप माना जाता है. इनकी पूजा नवरात्रि के छठें दिन की जाती है. कात्यायनी माता अपने सभी भक्तों की मुराद पूरा करती हैं. इनको पापियों का नाश करने वाली देवी भी कहा जाता है. कहते हैं कि एक संत को देवी मां की कृपा प्राप्त करने के लिए काफी लंबा तप करना पड़ा था. शेर पर सवार माता की चार भुजायेंं हैं. बायें हाथ में कमल के साथ तलवार और दाहिने हाथ में स्वास्तिक है. आज जब समाज में पापियों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है, तो माता से प्रार्थना है कि वह एक बार फिर से आकर तेजी से पनपे पापियों का नाश कर दें, ताकि समाज में अराजकता न हो.

माँ कालरात्रि

कालरात्रि माता को नौ दुर्गा का सातवां रूप माना जाता है. उनकी पूजा सातवें दिन होती है. माता कालरात्रि के बाल बिखरे हुए होते हैं. माता की तीन आंखें हैं, तो उनके एक हाथ में तलवार होती है. दूसरे हाथ से वह आशीर्वाद देती हैं. बायें हाथ में मशाल लेकर वह अपने भक्तों को निडर बनने का सन्देश देती हैं. माता को शुभ कुमारी भी कहते हैं, जिसका अर्थ हमेशा अच्छा करने वाली होती है. आज जब पूरी दुनिया में नशाखोरी, चोरी, डकैती जैसी बुरी आदतें तेजी से अपने पैर पसारती जा रही हैं, तब माता कालरात्रि के एक और जन्म की जरुरत लगती है.

महागौरी

मां महागौरी को आठवीं दुर्गा कहा जाता है. सफेद गहने और वस्त्रों से सजी मां महागौरी की तीन आंखे और चार हाथ हैं. माता के ऊपर के बायें हाथ में त्रिशूल और ऊपर के दाहिने हाथ मे डफली है. कहा जाता है कि एक बार मां महागौरी का शरीर धूल की वजह से गन्दा हो गया और साथ ही पृथ्वी भी गन्दी हो गई. तब भगवान भोले ने गंगा जल से धूल को साफ किया तो उनका पूरा शरीर उज्जवल हो गया. इस कारण उन्हें महागौरी कहा जाता है. यह भी कहा जाता है कि गौरी मां की पूजा से वर्तमान अतीत और भविष्य के पाप से मुक्ति मिल जाती है. इसलिए समाज के उन लोगों को जो कुकर्मों की कालिख से पुते पड़े हैं, इस नवरात्रि में माता महागौरी की पूजा-अर्चना करनी चाहिए, ताकि उनका मन स्वच्छ हो सके और वह नेक रास्ते पर चल सकें.

सिद्धिदात्री

सभी प्रकार की सिद्धियां देने वाली माता सिद्धिदात्री को मां दुर्गा का नौवां स्वरुप माना जाता है. कहा जाता है कि भगवान शिव ने सिद्धिरात्रि कि कृपा से ही सारी सिद्धियों को प्राप्त किया था. कमल पुष्प पर आसीन होने वाली मां सिद्धरात्रि की चार भुजायें हैं. माता सिद्धिदात्री की पूजा नौवें दिन की जाती है. इनकी पूजा करने से माता किसी को निराश नहीं करती हैं. उम्मीद है माता के भक्त भी इस नवरात्रि पर प्रतिज्ञा लेंगे कि वह सही रास्ते पर आगे बढ़ेंगे.
वैसे तो नवरात्रि की पूजा की परंपरा सदियों से चली आ रही है, किन्तु इस पूजा का उद्देश्य नारी जाति की सुरक्षा से भी गहरे तक जुड़ा है. शायद  इसलिए ही कहा गया है कि 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताÓ. अर्थात जहां नारी का सम्मान होता है, वही देवी देवताओं का वास होता है. 

Sunday, 30 September 2018

जुकाम और खांसी के लिए रामबाण


मौसम में बदलाव के साथ ही कई प्रकार की बीमारियां व्यक्ति को अपना शिकार बनाती है। इनमें जुकाम और खांसी सबसे सामान्य हैं। साधारण सी बीमारी लगने वाली ये बीमारी आपको बहुत परेशान कर सकती है। इसके उपचार के लिए आप घरेलू उपाय आजमा सकते हैं, ये आसानी से उपलब्ध होते हैं और इनका कोई भी साइड इफेक्ट भी नही पड़ता है।

हल्दी

जुकाम और खांसी से बचाव के लिए हल्दी बहुत ही अच्छा उपाय है। यह बंद नाक और गले की खराश की समस्या को भी दूर करता है। जुकाम और खांसी होने पर दो चम्मच हल्दी पावडर को एक गिलास दूध में मिलाकर सेवन करने से फायदा होता है। दूध में मिलाने से पहले दूध को गर्म कर लें। इससे बदं नाक और गले की खराश दूर होगी। सीने में होने वाली जलन से भी यह बचाता है। बहती नाक के इलाज के लिए हल्दी को जलाकर इसका धुआं लें, इससे नाक से पानी बहना तेज हो जाएगा व तत्काल आराम मिलेगा।

गेहूं की भूसी

जुकाम और खांसी के उपचार के लिए आप गेहूं की भूसी का भी प्रयोग कर सकते हैं। 10 ग्राम गेहूं की भूसी, पांच लौंग और कुछ नमक लेकर पानी में मिलाकर इसे उबाल लें और इसका का?ा बनाएं। इसका एक कप का?ा पीने से आपको तुरंत आराम मिलेगा। हालांकि जुकाम आमतौर पर हल्का-फुल्का ही होता है जिसके लक्षण एक हफ्ते या इससे कम समय के लिए रहते हैं। गेंहू की भूसी का प्रयोग करने से आपको तकलीफ से निजात मिलेगी।

तुलसी

सामान्य कोल्ड और खांसी के उपचार के लिए बहत की कारगर घरेलू उपाय है तुलसी, यह ठंड के मौसम में लाभदायक है। तुलसी में काफी उपचारी गुण समाए होते हैं, जो जुकाम और फ्लू आदि से बचाव में कारगर हैं। तुलसी की पत्तियां चबाने से कोल्ड और फ्लू दूर रहता है। खांसी और जुकाम होने पर इसकी पत्तियां (प्रत्येक 5 ग्राम) पीसकर पानी में मिलाएं और काढ़ा तैयार कर लें। इसे पीने से आराम मिलता है।

अदरक

सर्दी और जुकाम में अदरक बहुत फायदेमंद होता है। अदरक को महाऔषधि कहा जाता है, इसमें विटामिन, प्रोटीन आदि मोजूद होते हैं। अगर किसी व्यक्ति को कफ वाली खांसी हो तो उसे रात को सोते समय दूध में अदरक उबालकर पिलाएं। अदरक की चाय पीने से जुकाम में फायदा होता है। इसके अलावा अदरक के रस को शहद के साथ मिलाकर पीने से आराम मिलता है।

काली मिर्च पाउडर

जुकाम और खांसी के इलाज के लिए यह बहुत अच्छा देसी ईलाज है। दो चुटकी, हल्दी पाउडर दो चुटकी, सौंठ पाउडर दो चुटकी, लौंग का पाउडर एक चुटकी और बड़ी इलायची आधी चुटकी, लेकर इन सबको एक गिलास दूध में डालकर उबाल लें। इस दूध में मिश्री मिलाकर पीने से जुकाम ठीक हो जाता है। शुगर वाले मिश्री की जगह स्टीविया तुलसी का पाउडर मिलाकर प्रयोग करें।

इलायची

इलायची न केवल बहुत अच्छा मसाला है बल्कि यह सर्दी और जुकाम से भी बचाव करता है। जुकाम होने पर इलायची को पीसकर रुमाल पर लगाकर सूंघने से सर्दी-जुकाम और खांसी ठीक हो जाती है। इसके अलावा चाय में इलायची डालकर पीने से आराम मिलता है।

हर्बल टी

हर्बल टी पीना फायदेमंद है। इससे ठंड दूर होती है और पसीना निकलता है, और आराम मिलता है। यदि जुकाम खुश्क हो जाये, कफ गाढ़ा, पीला ओर बदबूदार हो और सिर में दर्द हो तो इसे दूर करने के लिए हर्बल टी का सेवन कीजिए।

कपूर

कपूर की एक टिकिया को रुमाल में लपेटकर बार-बार सूंघने से आराम मिलता है और बंद नाक खुल जाती है। इसके अलावा यह कपूर सूंघने से ठंड भी दूर होती है। कपूर की टिकिया का प्रयोग करके सर्दी और जुकाम से बचाव कर सकते हैं।

नींबू

गुनगुने पानी में नींबू को निचोड़कर पीने से सर्दी और खांसी में आराम मिलता है। एक गिलास उबलते हुए पानी में एक नींबू और शहद मिलाकर रात को सोते समय पीने से जुकाम में लाभ होता है। पका हुआ नींबू लेकर उसका रस निकाल लीजिए, इसमें शुगर डालकर इसे गाढ़ा बना लें, इसमें इलायची का पावडर मिलाकर इसका सेवन करने से आराम मिलता है।

कालीमिर्च

आधा चम्मच कालीमिर्च के चूर्ण और एक चम्मच मिश्री को मिलाकर एक कप गर्म दूध के साथ दिन में लगभग तीन बार पीने से आराम मिलता है। रात को 10 कालीमिर्च चबाकर उसके ऊपर से एक गिलास गरम दूध पीने से आराम मिलता है। कालीमिर्च को शहद में मिलाकर चाटने से सर्दी और खांसी ठीक हो जाती है।

Friday, 14 September 2018

वृद्धावस्था में होने वाले फ्रैक्चर


जीवन के उत्तरार्ध में उम्र बढऩे के साथ—साथ अस्थियों एवं जोड़ों की तकलीफे बढऩी भी शुरु हो जाती हैं। अधिकांश उम्रदराज लोग इनके रोगों से कम या अधिक मात्रा में पीडि़त होते हैं और कष्ट सहते रहते हैं। यह एक स्वभाविक प्रक्रिया है जहां शरीर के अन्य भागों में और अन्य अंगों की कार्य पद्धति में शिथिलता आने लगती है और शारीरिक क्षमता में क्षरण शुरू हो जाता है। ऐसी अवस्था में जोड़ों में विकार पैदा हो जाना या हड्डियों का मामूली चोट से टूट जाना साधारण बात है। वृद्धावस्था में प्राय: रहने वाले रोग जैसे —दमा उच्च रक्तचाप, मधुमेह, शारीरिक शिथिलता एवं रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी, बीमारी की उग्रता को और बढ़ा देता है। इन सबके लिए उत्तरदायी है हड्डियों का क्षरण जिसके फलस्वरूप उनमें खोखलापन आने लगता है और वे मजबूती से शरीर का वजन और लोच सहन नहीं कर पाती। स्त्रियों में यह स्थिति रजोनिवृति के बाद शुरू होती है और पुरूषों में 50 वर्ष के बाद। स्त्रियों में इसका कारण एन्ड्रोजन नामक हार्मोन की कमी होना है। सामान्य गतिविधियों में कमी और शारीरिक व्यायाम का अभाव भी इस रोग को बढ़ाता है। गुर्दे संबंधी रोग व स्टीरोयड दवाओं का अत्यधिक प्रयोग या समुचित पोषक आहार का अभाव भी रोग को बढ़ाता है।

लक्षण

अधिकांश समय में रोगी वृद्ध स्त्री होती है जो ऊपरी तौर से स्वस्थ और सामान्य दिखाई देती है कुछ स्त्रियों को कमर दर्द अक्सर होता रहता है। कंधे की हड्डियों व कलाइयों में दर्द रह सकता है। इसका कारण मामूली चोट के फलस्वरूप इन भागों की हड्डियों में दरार पड़ जाना हट जाना है उनके जुड़ते ही दर्द कम होने लगता है।
उपचार : नियमित हल्की कसरत शरीर के सभी भागों में रक्त संचारण बढ़ाती है। जिससे हड्डियां का क्षरण कम हो जाता है। अगर रोगी स्टीरोयड दवाईयों का उपयोग कर रहा है तो उसे बंद कर देनी चाहिए, रजोनिवृति में इस्ट्रोजन की गोलियां चिकित्सक की देखरेख में ही लाभ पहुंचाती है। विटामिन —डी, कैल्शियम भी अति आवश्यक है। दूध में भरपूर कैल्शियम होता है अत: इसे अवश्य लें। अगर रोगी मोटापे से ग्रसित है तो इसको भी कम करने का प्रयास करें।
वृद्धावस्था में होने वाले फैक्चर
उपयुक्त कारणों की वजह से कुछ फैक्चर वृद्धावस्था में सामान्यत: देखे जा सकते है। जैसे— कलाई और कूल्हे में। इसको कभी सामान्य स्थिति न समझकर उचित इलाज करवाने से जटिलताओं से बचा जा सकता है।

कंधे की हड्डियां टूटना

अक्सर यह वृद्ध स्त्रियों में होता है। हाथों के बल गिर जाना या हाथों से जोर का धक्का लगना, इस चोट का कारण बनता है। कई बार रोगी को इस चीज का आभास नहीं होता है व अपना कार्य सुचारू रूप से या कुछ दर्द के साथ करता रहता है, परंतु कई बार असहनीय दर्द या नीले रंग के चकते जोड़ के आस—पास उभर आते हैं। इसका निदान एक्स—रे से किया जा सकता है।
उपचार: निदान के बाद हड्डी रोग विशेषज्ञ की सहायता से जोड़ को आराम देने के लिए प्लास्टर लगा दिया जाता है। कभी भी ऐसी स्थिति में सेक न करें । लगभग दो माह में हड्डी जुड़ जाती है।

कलाई की हड्डी का टूटना

इसे कोलीज फैक्चर कहते हैं। यह सर्वाधिक आम चोट है। अक्सर वृद्धों में होती है। यह हाथों के बल गिरने से होती है। कलाई में दर्द व सूजन आ जाना व जोड़ दिखने में खाने में काम आने वाले कांटे की शक्ल का हो जाता है। एक्स रे से रोग का निदान कर 4 सप्ताह का प्लास्टर लगा दिया जाता है।

कूल्हे की हड्डी का टूटना

60 वर्ष की उम्र के पश्चात होने वाले फैक्चरों में इसका प्रमुख स्थान है। बढ़ती उम्र के साथ अस्थि दुर्बलता इसका मुख्य कारण है। जिसके फलस्वरूप एक हल्की सी चोट या फिसलकर गिर जाने से भी कूल्हे की हड्डी टूट जाती है, कूल्हे की हड्डी के टूटने का मुख्य कारण है बाथरूम में फिसलना या अचानक चक्कर आकर गिर पडऩा। हड्डी टूटते ही रोगी उठ नहीं सकता व असहाय पीड़ा का अनुभव करता है। एक्स—रे द्वारा निदान कर शल्य क्रिया द्वारा आजकल इसका उपचार किया जाता है। शल्य क्रिया की अनेक विधियां है जिन्हें मरीज की उम्र शारीरिक परिस्थितियों के अनुसार कार्य में लाया जाता है।
 टूटे भाग में कील, स्टील, प्लेट या स्क्रू द्वारा आपस में जोड़ देना।
 हड्डी के टूटे सिरे को निकाल कर स्टील का सिर उस टूटे भाग पर स्थापित करना।
 कूल्हे के जोड़ को निकालकर मानव निर्मित कूल्हे द्वारा बदल देना।
 अधिक समय तक रोगी को बिस्तर पर रखना हानिकारक हो जाता है। शल्य क्रिया से रोगी जल्दी स्वस्थ होकर चलने फिरने लगता है व बहुत सी जटिलताओं से बच जाता है।

अंत में— वृद्धावस्था की बेहतरी न केवल उसके शारीरिक स्वास्थ्य पर निर्भर करती है बल्कि उसे मानसिक राहत भी मिलनी चाहिए। इस उम्र में चारों ओर से व्याधियां घेर लेती है और उनका यथोचित इलाज करवाना जरूरी हो जाता है। कभी कभी एकाकीपन भी दुख का कारण बन जाता है। ऐसे में एक सहानुभूति पूर्ण दृष्टिकोण अपनाना सुखदायी होता है। वृद्धावस्था बाल्यावस्था जैसी हो जाती है। जिसके कारण चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है और कई बार एक तनावपूर्ण वातावरण बना देता है। अत: हमें धैर्य के साथ ऐसी स्थिति से निपटना चाहिए जो कठिन हो सकती है पर असम्भव नहीं।