Saturday, 6 September 2014

ज्यादा चाय पीने से बढता है हृदय रोग का खतरा


यदि आप चाय बार-बार पीते हैं तो सावधान हो जाइए क्योंकि इसमें पाए जाने वाले कैफीन के कारण मूत्र की मात्रा में तीन गुना अधिक वृद्धि होती है। ज्यादा चाय पीने के कारण चाय में पाए जाने वाले कैफीन से मूत्र वृद्धि होने लगती है इससे दूषित मल, जिसका शरीर से मूत्र के रास्ते निकल जाना आवश्यक होता है वह शरीर अन्दर ही संचित होने लगता है, फलस्वरुप गठिया दर्द, गुर्दे संबंधी रोग तथा हृदय संबंधी रोग होने लगते है।
अधिक चाय का सेवन करने से एसिड के कारण पेट फूलना, पेट दर्द, कब्ज, एसिडिटी, बदहजमी, नींद न आना, दांत पीले होना जैसे रोग पैदा होने लगते हैं।
चाय के अत्यधिक प्रयोग से उसमें पाया जाने वाला कैफीन टैनिन नामक विष चाय के प्रभाव को अत्यधिक उत्तेजनाप्रद बनाते हैं। इसका मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव पडता है। जैसे-जैसे चाय का नशा बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे हृदय रोग,मानसिक रोगों में भी बढ़ोतरी होती जा रही है। कैफीन के प्रभाव से दिल की धड़कन बढ़ जाती है इससे हृदय रोग बढ़ रहे हैं।

हृदय रोग को निमंत्रण नाश्ता न करना


मानव जीवन शैली में छोटे छोटे परिवर्तन बहुत सी बीमारियों से बचाव का कारण बन सकते हैं और थोड़ी सी सावधानी बरत कर इन बीमारियों से बचा जा सकता है।
उदाहरण स्वरूप अमरीका में होने वाले एक शोध के अनुसार नाश्ता छोडऩे से दिल के दौरे का ख़तरा कई गुना बढ़ सकता है किन्तु समय पर नाश्ता करके इस बीमारी से बचा जा सकता है। शोध में यह बात सामने आई है कि जो लोग नाश्ते से मुंह मोड़ते हैं, उनमें दिल के दौरे या हृदय रोग से मौत का ख़तरा 27 प्रतिशत तक अधिक होता है और रात देर से सोने वाले लोगों में हृदय रोग का ख़तरा 55 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि नाश्ते को छोडऩा मोटापे, उच्च रक्तचाप, हाई कोलेस्ट्रॉल, और मधुमेह के साथ दिल के दौरे का कारण बनने वाले मुख्य कारणों में से एक है।

Friday, 5 September 2014

शाकाहार बचाए हृदय रोग और कैंसर से


मानें या ना मानें मांसाहार नैतिक, आध्यात्मिक और मानवीय दृष्टि से तो नुकसानदेय है ही, सेहत की दृष्टि से भी हानिकारक है। नैतिक या आध्यात्मिक आधार पर भले मांसाहार छोडऩा गंवारा न हो पर केलिफोर्निया के हृदयरोग विशेषज्ञ डा. डीन ओरनिश के अनुसार केवल शाकाहार अपनाकर हृदय और कैंसर रोग को आसानी से ठीक किया जा सकता है।
दवाईयां तो लेनी होगी लेकिन उनका असर सत्तर प्रतिशत तेजी से होगा। डा. डीन पहले ऐसे चिकित्सा विज्ञानी हैं जो रोगियों को बिना चीर फाड़ किए ठीक करने में यकीन करते हैं। न केवल यकीन करते हैं, बल्कि उन्होंने इलाज के लिए आए मरीजों की खानपान की आदतें बदल कर उन्हें ठीक किया है। ब्रिटेन में हुए एक ताजा अध्ययन के मुताबिक शाकाहारी लोगों में कैंसर और हृदय रोगों का जोखिम मांसाहारी लोगों की तुलना में 40 प्रतिशत और असमय मृत्यु का खतरा 20 प्रतिशत कम होता है। इस अध्ययन के मुताबिक मांसाहार के पक्ष में पर्यावरण, प्रकृति संतुलन और आसानी से पौष्टिक भोजन मिल जाने की जो दलीलें दी जाती हैं वे सब गलत साबित हुई हैं। अध्ययन के अनुसार मनुष्य की आंतों से लेकर पाचन संस्थान के तमाम अंग अवयव जिनमें जीभ, दांत, ओठ, हाथ पैर की अंगुलियां भी शामिल हैं, मांसाहार के लिए कतई उपयुक्त नहीं है।
शरीर स्वयं विकसित हुआ हो या प्रकृति ने बनाया हो वह अनाज और शाकपात से ही पोषक रस खींच सकता है। हजम करने के लिए मांस को जिस हद तक पकाया जाता है, वह गए गुजरे किस्म के अनाज से भी गया बीता हो जाता है। सार यह कि मनुष्य को स्वस्थ और पुष्ट रखने के लिए शाकाहार ही उपयुक्त है। और स्वस्थ शरीर में आत्मा के विकास की पर्याप्त संभावना रहती है।

हृदय रोगों का इलाज संभव है सर्जरी के बगैर


बीते कुछ सालों में हृदय रोगों के उपचार में अत्यंत प्रगति हुई है। चाहे दिल के क्षतिग्रस्त वाल्व की बात हो या अवरुद्ध हो चुकी धमनी की, पीडि़त शख्स न्यूनतम पीड़ा वाले सबसे सुरक्षित विकल्प और सर्वोत्तम परिणामों की अपेक्षा कर सकते हैं। आइए जानते हैं, उन आधुनिक तकनीकों के बारे में जो कुछ हृदय रोगों के इलाज में सुरक्षित व कारगर साबित हुई हैं..

ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वाल्व रिप्लेसमेंट(टीएंवीआर)

यह 'ओपन हार्ट सर्जरीÓ के बगैर वाल्व बदलने की एक तकनीक है। हृदय एक मांसपेशीय पम्प है, जो लिवर, गुर्दो, और मस्तिष्क के सभी भागों को ऑक्सीजनयुक्त रक्त भेजता है। 'एओर्टिक वाल्वÓ रक्त को केवल एक दिशा (आगे की ओर) में प्रवाहित करता है। जन्म से इस वाल्व में विकार या दोष के कारण या उम्र बढऩे के कारण, इस वाल्व में कैल्शियम जमने लगता है। इस कारण यह सकरा हो जाता है और पूरी तरह खुल नहीं पाता। इससे खून का मस्तिष्क में और शेष शरीर में आना रुक जाता है। ऐसी स्थिति को 'एओर्टिक स्टेनोसिसÓ कहा जाता है। एओर्टिक स्टेनोसिस लगभग 4 से 5 प्रतिशत बुजुर्गो को प्रभावित करता है और गंभीर रूप से प्रभावित होने पर अधिकांश पीडि़त लोगों की कालांतर में मृत्यु हो जाती है।
हाल में ही, इस वाल्व के स्थान पर नया वाल्व लगाने का एकमात्र तरीका एक प्रमुख ऑपरेशन था, जिसमें रोगी को 'बाईपास पम्पÓ पर रखने और नया वाल्व डालने के लिए हृदय को खोलने की जरूरत पड़ती थी। अब चिकित्सा विज्ञान में मिली सबसे बड़ी सफलताओं में से एक में, यह कार्य कैथ लैब में एंजियोप्लास्टी जैसी प्रक्रिया की तरह, जांघ से ऊपर के स्थान में छिद्र करके ऑपरेशन के बगैर किया जा सकता है। यह प्रक्रिया लगभग दो घंटे तक चलती है। इसके अलावा गैर सर्जिकल होने के कारण, यह अधिक सुरक्षित होती है। रोगी को तीन से चार दिनों के अंदर छुट्टी दी जा सकती है। इस प्रक्रिया की विशेष रूप से उन बुजुर्गो के लिए उपयोगिता ज्यादा है, जिनकी अधिक उम्र के कारण सर्जरी करना जोखिम भरा होता है।
हाल में हमारी टीम ने देश में पहली बार तीन रोगियों (जिनकी उम्र 71, 72 व 80 साल की है) के सफल उपचार के लिए इस तकनीक का प्रयोग किया। गंभीर एआर्टिक स्टेनोसिस से पीडि़त इन रोगियों को जोखिम के कारण सर्जरी के लिए मना कर दिया गया था और इलाज न करने से अगले दो वर्षो में इनकी मौत हो सकती थी। ये तीनों रोगी तेजी से स्वस्थ हुए और अब सभी तरह की गतिविधियों के साथ सामान्य जीवन जी रहे हैं।

बॉयोएब्जॉर्बेबल स्टेंट

जब हृदय की धमनियां कोलेस्ट्रॉल जमा होने से अवरुद्ध हो जाती हैं, तो इस स्थिति में दिल के दौरे पड़ सकते हैं। हृदय-धमनी रोग के उपचार में सबसे अधिक प्रयोग की जाने वाली और सफल उपचारों में से एक एंजियोप्लास्टी है। एंजियोप्लास्टी के अंतर्गत दवा की पर्त वाले छोटे स्टेनलेस स्टील के स्प्रिंग जैसे साधन रुकावट हटाने और धमनियों को खुला रखने के लिए धमनियों में डाले जाते हैं, जिन्हें 'ड्रग इल्यूटिंग स्टेंटÓ कहा जाता है। गौरतलब है कि दिल की धमनियों में जिंदगी भर धातु के टुकड़े पड़े रहने से कुछ हानियां होती हैं। जैसे रोगी को जिंदगी भर रक्त पतला करने वाली दवा लेनी पड़ती है। अब प्लास्टिक जैसे पदार्थ से बने ऐसे 'स्टेंटÓ आ गए हैं जो हृदय की धमनियों को खोलने के बाद दो वर्षो में धमनियों को सामान्य रूप में छोडऩे के बाद, धीरे-धीरे घुल जाते हैं और समाप्त हो जाते हैं।

रीनल डिनर्वेशन थेरेपी

एक नया उपचार सामने आया है, जिसे रीनल डिनर्वेशन थेरेपी कहा जाता है। यह एक ऐसा उपचार है, जिसमें एक संक्षिप्त गैर सर्जिकल एंजियोप्लास्टी जैसी चिकित्सा प्रक्रिया के द्वारा गुर्दे में जाने वाली नसों को माइक्रोवेव कैथेटर से अवरुद्ध किया जाता है। अगले दिन से रोगी चलने लगता है और उसे छुट्टी दे दी जाती है। इस प्रक्रिया से अनियंत्रित रक्तचाप को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है। इस चिकित्सा प्रक्रिया को अनियंत्रित रक्तचाप की समस्या का एक बार में ही किया जाने वाला इलाज माना जा रहा है। इससे रक्तचाप की जिंदगी भर चलने वाली दवाओं से छुटकारा मिल सकता है।

Thursday, 4 September 2014

एनीमिया : देशी उपचार


एनीमिया मतलब शरीर में खून की कमी यानी रक्त-अल्पता। एनीमिया एक गंभीर समस्या है, इसके कारण रक्त में लाल रक्त कणिकाओं की कमी हो जाती है। इसे हीमोग्लेबिन का कम होना या एचबी में कमी आना भी कहते हैं। शरीर में खून की कमी से स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। इसके कारण शरीर का रंग पीला पडऩे लगता है, त्वचा बेजान दिखने लगती है और थकान की समस्या हो जाती है। आगे जानिए एनीमिया के घरेलू उपचार के बारे में-

बादाम

एनीमिया में बादाम का सेवन करना चाहिए, इससे खून की कमी दूर होती है। रोज रात को बादाम भिगोकर सुबह पीसकर दूध में मिलाकर पीने से भी खून की कमी शरीर में नहीं होती है। यह शरीर को भी स्वस्थ बनाये रखता है और कई खतरनाक बीमारियों से भी बचाता है।

सोयाबीन

खून की कमी दूर करने में सोयाबीन का महत्वपूर्ण स्थान है। इसमें आयरन के साथ-साथ प्रोटीन भी पाया जाता है। चूंकि एनिमिया के रोगी की पाचन शक्ति कमजोर होती है इसलिये सोयाबीन का दूध बनाकर पीना अधिक फायदेमंद है।

सेवफल

एक सेवफल यानी सेब के रस में दो चम्मच शहद मिलाकर रोज पीने से खून की कमी दूर होती है। टमाटर और सेवफल दोनों के रस को 100-100 मिली लेकर मिला लीजिए, और इसका सेवन सुबह खाली पेट करने से खून की कमी दूर हो जाती है।

तुलसी

एंटी-ऑक्सीडेंट गुणों से भरपूर तुलसी हमारे शरीर के लिए बहुत फायदेमंद है। यह एनीमिया में भी बहुत फायदेमंद है, तुलसी के नियमित सेवन करने से खून की कमी की समस्या दूर होती है। तुलसी के रस को शहद के साथ मिलाकर नियमित सेवन कर सकते हैं।

पालक

खून की कमी को दूर करने के लिए पालक बहुत जरूरी है। पालक में भरपूर मात्रा में लौह तत्व पाया जाता है। यह लौह तत्व शरीर में तेजी से लाल रक्त कणिकाओं को बनाता है। आप पालक की सब्जी के अलावा इसका जूस भी पी सकते हैं।

चुकंदर

इसमें आयरन के तत्व बहुत ज्यादा मात्रा में पाये जाते हैं, यह खून में हीमोग्लोबिन का निर्माण कर लाल रक्त कणिकाओं की सक्रियता को बढ़ाता है। चुकंदर की पत्तियों में भी आयरन भरपूर मात्रा में पाया जाता है। इसे आप सलाद के रूप में प्रयोग कर सकते हैं। चुकरंदर का रस दिन में दो बार पियें।
मेथी की सब्जी
मेथी की सब्जी भी खून की कमी को दूर करता है, कच्ची मेथी खाने से भी शरीर को आयरन मिलता है। किशोरावस्था में लड़कियों में होने वाली खून की कमी को दूर करने के लिए मेथी की पत्तियां उबालकर उपयोग करने से बहुत फायदा होता है। मेथी के बीज अंकुरित कर नियमित खाने से भी खून की कमी नहीं होती है।

धनिया

धनिया आयरन से भरपूर होता है जिसके कारण एनीमिया की समस्या से निजात दिलाता है। इसके अलावा धनिया की छोटी-छोटी पत्तियों और बीजों में पोषक तत्वों का खजाना छिपा है। इसमें एंटी ऑक्सीडेंट, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, सोडियम,
पोटैशियम और विटामिन ए, बी1, बी2 और सी जैसे तत्व पाये जाते हैं।

अंगूर

अंगूर का नियमित सेवन करने से खतरनाक बीमारियों से बचाव होता है। अंगूर में आयरन प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, इसलिए एनीमिया की समस्या होने पर अंगूर का सेवन कीजिए। अंगूर खाने से शरीर में हीमोब्लोबिन भी बढ़ता है। इसके अलावा आम, अमरूद आदि फल भी एनीमिया में फायदेमंद हैं।

Wednesday, 3 September 2014

हार्ट अटैक : घातक बीमारी

हृदय : एक परिचय

यह छाती के मध्य में, थोड़ी सी बाईं ओर स्थित होता है।
यह एक दिन में लगभग 1 लाख बार धड़कता है एवं एक मिनट में 60-90 बार।
यह हर धड़कन के साथ शरीर में रक्त को पम्प करता है।
हृदय को पोषण एवं ऑक्सीजन, रक्त के ज़रिए मिलता है जो कोरोनरी आर्टरीज़ द्वारा प्रदान किया जाता है।
हृदय दो भागों में विभाजित होता है, दायां एवं बायां। हृदय के दाहिने एवं बाएं, प्रत्येक ओर दो चैम्बर होते हैं।
हृदय का दाहिना भाग शरीर से दूषित रक्त प्राप्त करता है एवं उसे फेफडों में पम्प करता है।
रक्त फेफडों में शोधित होकर ह्रदय के बाएं भाग में वापस लौटता है वहां से शरीर में वापस पम्प किया जाता है।
चार वॉल्व, दो बाईं ओर (मिट्रल एवं एओर्टिक) एवं दो हृदय की दाईं ओर (पल्मोनरी एवं ट्राइक्यूस्पिड) रक्त के
बहाव को निर्देशित करने के लिए एक-दिशा के द्वार की तरह कार्य करते हैं।
हार्ट अटैक अपने आप में ही एक भयानक व घातक बीमारी का नाम है। इस बीमारी के नाम मात्र से ही लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इसका मुख्य कारण, हृदय की मांसपेशियों के एक भाग में आक्सीजन युक्त रक्त का प्रवाह अवरूद्ध हो जाना होता है। रक्त का प्रवाह न होने के कारण हृदय अपना कार्य करना बंद कर देता है, जो मृत्यु का कारण बनता है। विश्व भर में हृदय गति रूकने से मरने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है।

हृदय असंख्य पतली - पतली नसों एवं मांसपेशियों से युक्त एक गोल लम्बवत् खोखला मांस पिण्ड होता है। इसके अन्दर चार खण्ड (पार्ट) होते हैं और प्रत्येक खण्ड में एक ऑटोमैटिक वाल्व लगा रहता है। इससे पीछे से आया हुआ रक्त उस खण्ड में इक_ा होकर आगे तो जाता है, परन्तु वापस आने से पहले वाल्व बन्द हो जाता है, जिससे वह रक्त शरीर के सभी भागों में चला जाता है। ऐसा हृदय के चारों भागों में चलता रहता है। जब इन ऑटोमैटिक वाल्व में खराबी आ जाती है, तो रक्त पूरी मात्रा में आगे नहीं जा पाता और कुछ वापस आ जाता है, इससे रक्त सारे शरीर को पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाता है और कई तरह की परेशानियाँ खड़ी होती हैं। हृदय पर अतिरिक्त बोझ पडऩे लगता है। जिससे उसमें अचानक तीव्र दर्द उठता है, जो असहनीय होता है। यह दर्द सीने के बीच के हिस्से में होता हुआ बायीं बाजू, गले व जबड़े की तरफ जाता है।

कारण

ज्यादा चर्बीयुक्त आहार प्रतिदिन लेने से वह चर्बी नसों में इक_ी होती जाती है और धमनियों में सिकुडऩ या छेद हो जाता है इससे रक्त संचार धीमा हो जाता है, जिससे हृदय में अतिरिक्त दबाव बढ़ जाता है और शरीर में रक्त प्रवाह की कमी हो जाती है। इस स्थिति में जब हम तेज - तेज चलते हैं, सीढिय़ाँ चढ़ते है या कोई वजन उठाते है, तब हमें ज्यादा ऊर्जा की जरूरत पड़ती हैै।
हृदय रोग अथवा दिल का दौरा पडऩे का मुख्य कारण, उच्च रक्तचाप माना जाता है। उच्च रक्तचाप विभिन्न रोगों से होने वाली मौतों का एक प्रमुख कारण है। यह रोग मस्तिष्क आघात, दिल का दौरा और हार्ट या किडनी फेल्योर का कारण बन सकता है।

हृदय रोग के लक्षण

आम तौर पर एक सामान्य स्वस्थ व्यक्ति का ब्लड प्रेशर 120/80 होना चाहिए। अगर किसी व्यक्ति का ब्लडप्रेशर 135/85 एमएमएचजी से अधिक है, तो फिर यह दिल की सेहत के प्रति सचेत करने वाला लक्षण है। अगर कुछ दिनों तक नियमित विश्राम करने व नियमित रूप से चेक कराने के बाद ब्लड प्रेशर 135/85 से अधिक रहता है, तो इस स्थिति को हाई ब्लडप्रेशर कहा जाता है। ब्लड प्रेशर को दो इकाइयों में बांटा जाता है। ऊपर के ब्लड प्रेशर को सिस्टोलिक और नीचे के ब्लडप्रेशर को डाइस्टोलिक कहा जाता है।

ध्यान देने योग्य बातें

  • शरीर की आवश्यकता के अनुसार ही कम चिकनाईयुक्त आहार लेना चाहिए। 40वर्ष की उम्र के बाद आवश्यकता से अधिक खाना स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक है। नसों में अत्यधिक चर्बी के जमाव को रोकने के लिए चोकरयुक्त आटे की रोटियाँ, ज्यादा मात्रा में हरी सब्जियाँ, सलाद, चना, फल आदि का उपयोग करें।
  • खाने में लाल मिर्च, तीखे मसाला आदि एक निर्धारित मात्रा में ही सब्जी में डालें तथा ज्यादा तली चीजें, तेल युक्त अचार आदि बहुत कम मात्रा में लें। एक बार में ज्यादा खाना न खाकर आवश्यकतानुसार थोड़ा-थोड़ा कई बार खाना खायें।
  • सूर्योदय के पहले उठना, धीरे - धीरे टहलना, स्नान आदि करके हल्के योग एवं ध्यान आदि प्रतिदिन करना चाहिये।
  • मांसाहार, अण्डे, शराब व धूम्रपान, तम्बाकू आदि से पूर्णत: अपने आपको बचायें। ये हृदय एवं शरीर के लिये अत्यन्त घातक हैं इसलिये इनका भूल कर भी सेवन न करें।
  • मानसिक तनाव को दूर रखें। इससे हृदय में दबाव पड़ता है। सदा ही प्रसन्न रहने की कोशिश करें, क्रोध बिल्कुल न करें, सदा हंसते रहें।
  • नमक का सेवन कम करे।

हृदय रोग से सम्बन्धित बीमारियाँ

उच्च रक्तचाप
उच्च रक्तचाप के लगातार बने रहने से हृदय में अतिरिक्त दबाव बना रहता हैै, जिससे हृदय रोग होने की सम्भावना ज्यादा रहती है। अगर समय रहते दवाओं के माध्यम से ब्लड प्रेशर को सामान्य कर लिया जाये, तो हृदय रोग होने की सम्भावना घट जाती है।
गुर्दे की बीमारियाँ
गुर्दे की कई प्रकार की बीमारियों की वजह से खून की सफाई का कार्य बाधित होता है और हृदय में दूषित खून के बार - बार जाने से उसकी मांसपेशियाँ कमजोर पडऩे लगती है, जो हृदय रोग का कारण बनती हैैं।
डायबिटीज अर्थात् मधुमेह
जब डायबिटीज के कारण खून में शुगर की मात्रा बढ़ जाती है और लम्बे समय तक बराबर बनी रहती है, तो धीरे - धीरे यही हृदय रोग का कारण बनती है।
मोटापे की अधिकता
जब अनियमित खान-पान से या कई प्रकार की हार्मोनल बीमारियों से व्यक्ति का मोटापा बढ़ जाता है तब भी हृदय रोग सामान्य से ज्यादा होने की सम्भावना रहती है।
पेट में कीड़े (कृमि) होने पर
जब आमाशय में दूषित खान - पान की वजह से कृमि पड़ जाते हैं और समय से इलाज न मिलने की वजह से पर्याप्त बड़े हो जाते है, तब वे वहां रहते हुए आपका खाना भी खाते हैं तथा दूषित मल भी विसर्जित करते हैं और वही खून हृदय में बार-बार जाता है जो हृदय रोग का कारण बनता है।

शराब की लत छुड़ाए होमियोपैथी

प्रतिदिन दवाखाने में मरीज के नजदीकी, उनकी पत्नी, भाई, भाभी अथवा मां आते हैं जो अपनी पीड़ा व्यक्त करते हैं कि उनका पति, भाई, देवर या उनका बेटा शराब की बूरी लत में पड़ गया है। क्या ऐसा कोई उपाय होम्योपैथी है जिससे इस बूरी लत से छुटकारा पाया जा सकता है? कुछ परिजन तो ऐसे भी आते हैं जो बताते हैं कि शराब न मिलने पर कुछ अन्य कफ सिरप या दूसरी चीजें भी पीने के आदी हो जाते हैं, जिससे इनका खुद का तथा परिवार का जीवन स्तर बदतर होता जाता है।
शराब का उपभोग मजे तथा जीवन का आनंद लेने के साथ जुड़ा हुआ है. लेकिन अत्यधिक मात्रा में गैरजिम्मेवार तरीके से इसका सेवन जीवन को ही दूर कर देता है. शराब की बुरी लत को 'अल्कोहलिज्मÓ कहते हैं. जब कोई इंसान शराब का आदी हो जाये और वह उसके बगैर अपने को कमजोर समझने लगे. किसी भी कीमत पर उसे छोडऩे को तैयार न हो, उसकी कमी उसे हमेशा महसूस होती रहे. उसके लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहे. ऐसी स्थिति में शराब का सेवन उसके परिवार व स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह होता है.
शराब जो पहले शौक बनती है. फिर आदत और बाद में जरूरत बन कर इनसान को शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक, सामाजिक एवं वित्तीय रूप से काफी नुकसान पहुंचाती है. ऐसा हम हमेशा टीवी चैनलों या अखबारों के माध्यम से देखते और पढ़ते हैं कि इनसान ज्यादातर गलत काम शरीब पीकर ही करता है. यहां तक कि बलात्कार जैसी गंदी वारदात भी शराब को पीकर ही करता है. वरना कोई चार/पांच साल तक की बच्चियों का बलात्कार कभी होश में नहीं कर सकता है, शराब ही उसके मानसिक संतुलन को बिगाड़ देती है.
जब ऐसी गंदी लत किसी को लग ही जाती है, तब उसे इस दलदल से निकालने का कत्र्तव्य हम चिकित्सकों का हो जाता है कि वह इंसान शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक एवं सामाजिक स्तर पुन: मान-सम्मान पा सके. ऐसी लत को छुड़ाने में होमियोपैथिक दवाइयां काफी कारगर होती है. वशर्ते वह इन्सान दवाओं को दिल से स्वीकार करें.
अल्कोहलिज्म यानी शराब की लत का शरीर के विभिन्न अंगों पर क्या असर होता है, पहले यह जान लें.
पाचन तंत्र : सुबह उठते ही उल्टी जैसा लगना, भूख में कमी, अपच जैसा पतला शौच करना, कभी-कभी मुंह से उल्टी के साथ रक्त जैसा आना, आंत नली का कैंसर तक हो जाना.
यकृत (लीवर): यकृत की कोशिकाओं में चर्बी जमा हो जाना (फैटी लीवर), सिरोसिस लीवर, पेन्क्रियाज में सूजन.
दिमागी तंत्र : यादाश्त में कमी, सोचने, समझने की क्षमता कम हो जाती है.
मांसपेशियां : छाती एवं कमर की मांसपेशियां सूखने लगती है.
अस्थि तंत्र : हड्डियां कमजोर हो जाती है. कैल्शियम, मैग्निशियम, फास्फोरस एवं विटामिन डी की कमी से, हड्डी टूटने पर जुडऩा मुश्किल हो जाता है, हड्डी की मज्जा कमजोर होकर, लाल रक्त कण, श्वेत रक्त कण एवं प्लेटलेट कम कर देता है.
हार्मोनल तंत्र : इंसुलीन की कमी से डायबिटीज हो जाती है.
हृदय तंत्र : उच्च रक्त दबाव हो जाता है.
श्वास नली तंत्र : दमा की शिकायत हो जाती है, क्योंकि प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है.
त्वचा : बैक्टीरिया, फफूंदी जल्द असर करते हैं और जल्दी समाप्त नहीं होते हैं, क्योंकि प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है. सोरियासिस जैसा चर्म रोग भी हो सकता हैै.
मर्दो में नपुंसकता एवं टेस्टीस (अंडकोष) सूख जाते हैं. स्त्रियों में ओवरी एवं बच्चेदानी में खराबी, बच्चा न होना, बार-बार गर्भ गिरना (हेबिचुअल अबोरशन) इत्यादि हो जाता है.

कारगर है होमियोपैथिक दवाइयां

स्टरकुलिया एकुमिनाटा : शरीर में अत्यधिक कमजोरी लगे जैसा हृदय की गति कम हो गयी हो, यह दवा भूख बढ़ाती है और खाना पचाने में सहायक होती है. मुंह का स्वाद ऐसा कर देती है कि शराब की महक से नफरत होने लगती है और उसकी इच्छा को कम कर देती है. 5-10 बूंद अर्क में सुबह-रात आधे कप पानी के साथ लें.
अवेना सटाइवा : मानसिक एवं यौन संबंधी कमजोरी लगे. शराब के बिना एक पल भी रहना मुश्किल लगे. नींद बिल्कुल गायब हो जाये, तब 10 से 20 बूंद मूल अर्क में थोड़ा कुनकुना पानी के साथ सुबह-रात लें.
क्यूरीकस ग्लैडियम स्प्रिटस : शराब से पैदा हुए डर बुरे असर को यह दवा काटती है.शराब के प्रति नफरत पैदा करती है, क्योंकि यह दवा लेने के बाद जब भी कोई शराब लेता है, तब उसे उल्टी के जैसा लगता है या उल्टी हो सकती है, इसलिए डर से शराब छोडऩे लगता है. यह दवा 10 बूंद मूल अर्क लेकर एक चम्मच पानी के साथ दिन मेें चार बार लें.
नक्स वोमिका : वैसे स्वभाव के लोग शराब अधिक लेते हों, पतले, चिड़चिड़े हो, जरा सा भी शोर रोशनी और खुशबू बर्दाश्त न होती हो. सुबह उठते ही या खाना खाने के बाद उल्टी के जैसा लगता हो, भूख में बहुत कमी रहती हो और हमेशा शराब की जरूरत महसूस होती है. तब 200 शक्ति की दवा रोज रात में ले. काफी लाभ पहुंचेगा और शराब के द्वारा पैदा सभी खराबियों को सही कर देगा.
- डॉ. ए. के. द्विवेदी